कविता-कानन
कविताएँ
मेरी बेटी
मेरी बेटी अब माँ बन गयी है
बचपन में
कई बार पोछें हैं मेरे आंसू
फ्रॉक के घेर से
ज़ख्मों पर फूँक मार
उड़ाकर दर्द को
हथेलियाँ नचा
काफूर कर दी है सारी पीड़ा…
अनेकों बार
छोटीसी गोद में सिर रख
दुलारा है मेरी थकन को
और भर दी है स्फूर्ति…
अब वह नन्ही
बड़ी हो गई है
नन्ही को सीने से लगा
हरती है उसकी पीड़ा
आँचल में छिपा
दुलारती है उसे
भरती है जीवन की ऊर्जा।
ताज्जुब करती है
माँ,
माँ बनना कितना सुखद होता है
एक विचित्र सा एहसास
मेरे खून, मासपेशियों से बनी
मेरा अंश..!
मेरा अपना सृजन..!
अद्वितीय है
यह अनुभव माँ
निहारती हुए
हर हरकत पर भरमाते हुए
छिपा लेती है उसे दुनिया से
बुरी नज़र से दूर।
मेरी नन्ही अब माँ बन गयी है।
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वह मासूम बच्ची
पहली बार
खिले फूलों को देख खुश होती रही
फिर फूलों का मुरझाना देखा …
देखती गई,
आँसू झरते रहे …उसने पंखुड़ियों को सहेज लिया
उसने बहती नदी देखी
अठखेलियाँ करती
वह खिल उठी
ज़मीन ने सोख लिया जल
नदी सूख गई……
दुख से कातर हो …नमी को मुट्ठियों में सोख लिया
खिड़की से उसने वह दरख्त देखा
एक घौंसला था
नन्हें नन्हें अंडे थे
वह देखती रही
बच्चे उड़ गए
उसने घोंसले का सूनापन देखा
उसे आँखों में रोक लिया …व्यथा को बहने ना दिया
फूलों से लदे वृक्ष देखे
झूले की पींगें देखीं
बच्चों का खिलखिलाना देखा
फिर पतझर में पेड़ का
ठूंठ बन जाना देखा ….
झडे पत्तों को बाहों में समेट लिया ….उड़ने न दिया
माँ की गोद में बचपन सुहाना देखा
प्यार से माँ का मनाना देखा
ज़रा सी खरोंच जो आने न दे
सबसे गहरा जख्म दे
छोड़कर जाना देखा….
उसने यादों को सीने में भींच लिया….खोने न दिया
और एक दिन
दे दिये शब्द सारी व्यथाओं को
लिख डाली एक कविता
अपनी पहली कविता …
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शापित
सूरज उससे अनभिज्ञ है
किरणें अनजान !
ख़ौफ़ज़दा रहती है वह
शाम के धुंधलके से –
और रात लाती है फरमान !
चल तेरे मरना का वक़्त आ गया
बंद कर देती है सारी
ख्वाइशें , सपने , यादें
और रख देती है वह संदूकची
उसी आले पर …..
जड़ लेती है चेहरे पर हँसी –
पोत लेती है रंग रोगन –
और बन जाती है नुमाइश …
हसरतों पर कोई पाबंदी नहीं
जितना चाहे चुग्गा डाल दे
घेरे रहती हैं उसे –
पर पालती नहीं उन्हें
लहू लुहान होने के डर से
और नामुराद आंसू-
मूँह छिपाये फिरते हैं
हंसी उसका वस्त्र है
और उपहास उसकी नियति
और रिश्ते….!
एक मृगमरीचिका –
जिसमें केवल आस है
यहाँ लोग रिश्ते कायम तो करते हैं
निभाते नहीं
सदियों से ब्रह्मकमल सी खिलती आयी है
सुबह होते ही …मुरझा जाने के लिए ….
– सरस दरबारी





