कविता-कानन
समय
लकीरें ही नहीं होती
सिर्फ हथेलियों में
होती है
उम्र के ढलान की
एक लंबी सड़क
होती है
विचारों की भीड़
और
रिश्तों की कसमसाहट
होती है
फूलती साँसें
और डगमगाते क़दम
फिर
खो जाते हैं हम
विचारों की भीड़ में
एक टूटे पत्ते की तरह
स्वच्छन्दता की चाह में
एक नए बदलाव की ओर
बस लुढ़कते जाते हैं
उम्र के ढलान पर
– प्रदीप कुमार




