संस्मरण
‘स्कार’ अंडर लोअर लिप
मैं जब भी अपने बच्चों को मोबाइल व लेपटॉप पर गेम्स खेलते देखती हूँ तो अपने बचपन की गलियारों में पहुंच जाती हूँ। मैं बड़ी देर से अपनी बेटी रिया को किचन गार्डन में बुला रही थी। छुट्टी का दिन था लेकिन रिया सुबह से अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली। सर्दियों के दिन और ऊपर से सूरज की मखमली धूप की तपिश में मेरा ऊंघने का मन कर रहा था। छुट्टी वाले दिन बाल धोकर उन्हें धूप में सुखाना, ये मेरी बचपन की आदत थी। छुट्टी ही क्या हम बच्चे तो केवल बरसात मे, कड़ी धूप में या अपने रोज़मर्रा के कामों के वक्त ही घर में होते थे। बाकि तो बस सुबह-शाम गली-मुहल्लों में खेल ही खेल और धमाचौकड़ी।
स्कूल से घर पहुंचे नहीं कि ड्रेस बदलकर, झटपट खाना खाया व स्कूल का काम खत्म करके मुहल्ले के सारे बच्चे, मन्दिरों के मुहल्ले में पहुंच जाते। सचमुच वो मुहल्ला मन्दिरों का ही था। राधा-कृष्ण, शीतला माता, काली माता, सीता-राम व शिवजी के बड़े-बडे मन्दिर एक कतार में आमने सामने थे। सभी मन्दिरों के दो बड़े-बडे़ प्रांगण थे, सड़क के आजू-बाजू में पाँच-सात सीढ़ियों की ऊंचाई पर ये सभी मन्दिर हम सभी बच्चों का खेल प्रांगण थे। एक बड़ा-सा हवन कुंड, जिसके चारों ओर बच्चे घूम-घूम कर खेलते और पास ही में मीठे पानी की दो बांवड़ियां। मन्दिर की धर्मशाला के ऊपर ही बालवाड़ी केन्द्र व उसी में एक छोटा-सा पुस्तकालय था, जो बालवाड़ी स्कूल बंद होने के उपरान्त शाम 4 बजे से 7 बजे तक खुलता था।
कभी खेलने का मन न हुआ तो बच्चे पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ने चले जाते। मैं बचपन से ही कहानियां पढ़ने की बड़ी शौकीन थी। जब तक दो चार चित्रकथाएं, बाल पुस्तकें जैसे चंपक, बालहंस, नंदन, चाचा-चौधरी, बिल्लू न पढ़ लेती मेरा खाना ही हजम नहीं होता था। बाद में मैंने इन्हीं पुस्तकों के लिए युवावस्था में बाल-कहानियां लिखीं, जो धड़ाधड़ प्रकाशित भी हुईं। यकीनन मेरे अन्दर की लेखिका का सफर उसी छोटे से पुस्तकालय से शुरू हुआ था।
काफी देर तक बुलाने पर भी जब रिया बाहर नहीं आई तो मैं झुंझलाकर खुद ही उसके कमरे में चली गई।
“कितनी बार बोला है तुम्हें बेटा! धूप सेंका करो, धूप! हफ्ते में एक रोज़ तो तुम घर पर होती हो, वो भी सारा दिन ही हीटर के आगे खून फूंकने के लिए।” मैंने गुस्से में हीट पीलर का स्विच ऑफ किया तो रिया झट से कमरे से बाहर निकल आई।
“तुम सुबह से अन्दर कर क्या रही हो?” मैंने पूछा तो वो थोड़ा झल्लाकर बोली, “होमवर्क, मम्मा! होम वर्क!”
“होम वर्क तो बेटा, बाहर बैठकर भी हो सकता है। धूप की धूप और काम का काम।”
“कितनी बार बोला मैंने, मम्मा! मुझे बाहर यूँ पढ़ना अच्छा नहीं लगता। सब आते-जाते देखते हैं।” रिया मेरी बात सुनकर बोली।
“बाहर मोबाइल पर गेम्स खेलना तुम्हें अच्छा लगता है, तब तो तुम्हें कोई नहीं देखता। चलो! मोबाइल अन्दर रखो।” रिया के हाथ से मैंने मोबाइल झपटने की कोशिश की।
“आपको तो बस मेरी हर बात में प्रॉब्लम है। पाँच मिनट खेल लूंगी तो कुछ नहीं हो जाएगा।”
ये तो रोज़ का ही रोना है। अब तो मेरे छोटे बेटे भारतेश ने भी मोबाइल पर गेम्स खेलना शुरू कर दिया है।
“कैंडी-कश’ खेलना है मम्मा”, जब भी मेरा तीन वर्षीय बेटा गेम्स खेलने के लिए मोबाइल मांगता है तो मैं व्यथित हो जाती हूँ।
“कैसे हैं ये आजकल के बच्चे? एक-दूसरे के साथ भी खेल सकते हैं मगर इन्हें तो अलग-अलग बैठकर मोबाइल पर गेम्स खेलना है।” मैं मन ही मन बुदबुदाती।
मुझे याद नहीं कि हमने बचपन में ऐसा कोई खेल खेला हो जो अकेले खेला जाता हो। लुका-छुप्पी, खो-खो, चोर-सिपाही, पकड़म-पकड़ाई, कबड्डी ऐसे कितने ही खेल थे, जो बहुत सारे बच्चे मिलजुल कर खेलते थे। आज सोचती हूँ तो हमने इन खेल ही खेल में बहुत कुछ सीखा भी। आपसी तालमेल, मिलजुल कर रहना एक-दूसरे के काम सांझा करना, खेल के दौरान किसी को चोट लगे तो उसके लिए सद्भावना होना, यहाँ तक कि अच्छे-बुरे का भी काफी कुछ पता लगने लग गया था।
सांझेदारी की एक घटना तो सदैव मुझे गुदगुदाती है। मैं अपने घर के तीन बच्चों में सबसे बड़ी थी। हमारा एक छोटा-सा किचन गार्डन था, जिसमें बहुत सारी सब्जियां और फूल हम लोग लगाते थे। फूल तो इतने ज्यादा होते थे कि हमारे घर की पहचान “फूलों वाले घर” के तौर पर होती थी। हमारे घर से दो घर छोड़कर मीठे पानी की एक बड़ी-सी बावड़ी थी और मेरी ड्यूटी थी उस बावड़ी से पानी लाकर सब्जियां और फूलों को सींचना। जिस वजह से गर्मियों के दिनों में मुझे खेलने जाने के लिए वक्त लग जाता था। बच्चे ये बात ताड़ गए और फिर क्या सब बच्चे अपने-अपने घर से छोटी बाल्टियां लाकर मिलकर बावड़ी से पानी लाने लगे व कुछ ही देर में मेरी फुलवारी पानी से सिंचित हो जाती और मैं सब बच्चों के साथ खेलने के लिए दौड़ पड़ती। कितनी सुखद व गुदगुदाने वाली स्मृति है ये! आज मुझे एहसास होता है। आज भी मेरा मन किचन गार्डन में ज्यादा लगता है और चाहती हूँ कि मेरे बच्चे भी प्रकृति के नजदीक आकर इसकी सुखानुभूति लें। पर इन बच्चों का भी क्या कसूर! ज़माना ही टेक्नॉलोजी का आ गया है।
धीरे-धीरे ग्रुप में खेलते-खेलते बच्चों के खेल बदल गए। वो खेल जो एक-दूसरे को स्पर्श किए वगैर पूरे नहीं होते थे, उनमें दूरियां आ गई। क्रिकेट के बैट व हॉकी की स्टिक इतने लोकप्रिय हो गए कि अब एक-दूसरे को स्पर्श करने की जरूरत ही नहीं। बीच में क्रिकेट का बल्ला व हॉकी की स्टिक जो आ गई। आंख-मिचौली खेलती बार दूसरे बच्चे जब अपने दोनों हाथों से ढूंढ़ने वाले बच्चे की आँखे बन्द करते थे तो उसका स्पंदन आपस में मैत्री-भाव ही जगाता था। मगर अब तो हम अपने हाथों से किसी की दोनों आखों को हौले से दबाकर आत्मियता से चुपके से पीछे आकर पूछेंगें कि बताओ मैं कौन हूं? तो शायद सामने वाला गुस्से में हाथ झपट कर यह न कह बैठे कि ये क्या बदतमीज़ी है? किसी को यूं स्पर्श करना अब तहज़ीब व अपनेपन के दायरे में नहीं। क्रिकेट व हॉकी तक वो फिर ठीक था। कम से कम खेल के लिए दूसरे खिलाड़ियों की आवश्यकता तो थी मगर मोबाइल व लैपटॉप ने तो ये आवश्यकताएं ही खत्म कर दीं।
बस एक गेम क्लिक करो तो खुद ही बल्लेबाज, खुद ही गेंदबाज, खुद ही एम्पायर, खुद ही फील्डर व खुद ही दर्शक। हाँ, हार का ठीकरा टोकने वाले के सिर पर जरूर फूटता है।
“ये क्या कर दिया? मैं तो जीतने ही वाली थी, बीच में क्यों टोक दिया?” अकसर मोबाईल पर गेम्ज़ खेलने वालों से गेम खराब होने पर वही सुनने को मिलता है।
“न किसी का स्पर्श, न किसी की आवश्यकता, न मेलजोल न सहभागिता की भावना। भला ये भी कोई खेल हैं! मैं मन ही मन व्यथित हुआ करती हूँ।”
मैं अपनी बेटी को इन चीजों का एहसास दिलाना चाहती हूँ, पर कैसे? कैसे उसे बताऊँ कि आपसदारी में, प्रकृति के संग हम कितने जीवंत होते हैं। कितनी ही अनमोल यादों के खजाने हैं, जो मेरे मन के सांचे में संजोए हुए हैं।
“मेरा बचपन आज भी मेरे साथ हर मोड़ पर चलता है! कैसे बताऊँ मैं तुम्हें, मेरी बिटिया!”
मन्दिर के उस प्रांगण के बच्चों के साथ वहां एक ओर प्रहरी भी थे। वो थे “राजू भैया!”
सफेद धोती पहने और कंधे पर सफेद धोती लपेटे हुए संन्यासी का जीवन यापन कर रहे थे। उनका पूरा वक्त मन्दिरों की साफ-सफाई, रखरखाव, धार्मिक आयोजनों को करवाने में बीतता था। राधा-कृष्ण के मन्दिर का पूरा संचालन राजू-भैया ही करते थे। पूरी उम्र वे संन्यासी की तरह ही जिए। राजू भैया को हमारे मुहल्लों में सभी जानते थे व मानते भी थे।
उस रोज भी राजू भैया आसपास ही थे जब हम बच्चे शीतला माता के प्रांगण में पकड़म-पकड़ाई खेल रहे थे। अचानक खेल में पकड़ते-पकड़ते मुझे किसी बच्चे से धक्का लग गया और मैं शीतला माता मन्दिर की सीढ़ियों के कोने से जा टकराई।
मैं जोर से चीखी। मुझे अपनी ठोड़ी पर बहुत जोर से लगी थी और बुरी तरह से खून बहना शुरू हो गया।
सभी बच्चों ने खेल छोड़कर मुझे चारों ओर से घेर लिया, जिससे धक्का लगा वो बच्चा भी मेरे मुंह से खून बहता देखकर डर गया और मेरा तो हाल ही बुरा था। लग रहा था कि अस्पताल की बारी आ गई थी व ऊपर से मम्मी-डैडी की डांट सुनने का डर अलग।
उतने में राजू भैया सभी बच्चों को पीछे हटाकर मेरी ओर लपके।
“कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ!” राजू भैया ने मेरी गर्दन ऊपर उठाकर मेरी ठोड़ी को ध्यान से देखा और फिर मुझे पास वाली बावड़ी के पास ले गए। सारे बच्चे भी हमारे पीछे-पीछे आ गये।
फिर उन्होंने साफ पानी से मेरा मुंह धोया और फिर चोट का निरिक्षण कर मुझे कुछ देर रूकने के लिए कहकर झाडियों की ओर गए।
शायद उन्हें कुछ जड़ी-बूटियों का ज्ञान भी था। वो जल्दी ही एक बड़ा-सा पता लेकर आए और उससे निकलते दूध से उन्हें मेरी ठोड़ी पर लगाया। कुछ ही देर में खून बहना बन्द हो गया तो मेरी जान में जान आई।
राजू भैया फिर मुझे खुद हमारे घर छोड़ने आए।
मम्मी-डैडी पहले तो घबराए मगर बाद में राजू भैया की बातों से आश्वस्त हो गए।
कुछ ही दिनों में मेरा जख्म ठीक हो गया मगर वो जख्म मुझे जीवन पर्यन्त के लिए एक निशान छोड़ गया, जो मेरी ठोड़ी पर आज भी आइने में मुझे चिढ़ाता है।
वो बच्चे आज मेरे साथ नहीं है। राजू भैया भी हमारे बीच नहीं रहे। कुछ वर्ष पहले कैंसर से पीड़ित होकर राजू भैया हम सबको छोड़कर पंचतत्त्व में विलिन हो गए। सुना, तो मेरी आंखें डबडबा गई थीं। पहले जैसा कुछ भी नहीं है लेकिन सुखद स्मृतियों की यादें आज भी मेरे चेहरे पर अंकित हैं।
आज किसी भी दस्तावेज पर मेरी जब शारीरिक पहचान पूछी जाती है तो मैं कहती हूँ, “स्कार अंडर लोअर लिप।”
– कंचन शर्मा




