शेठ मूलचंदजी कृत- रीषभदेव बारमासा
- हस्तप्रत परिचय :
आचार्य कैलाशसागारसूरी ज्ञानमन्दिर, कोबा से प्राप्त पांडुलिपि “रीषभदेव बारमासा” का सम्पादन किया गया है। इस पांडुलिपि का सूची क्रमांक : AKGM-0131954 है। इस पांडुलिपि प्रतके अक्षर सुपाठ्य और स्पष्ट है। प्रस्तुत कृति के सम्पादन के लिए पांडुलिपि उपलब्ध कराने के लिए मै संस्था का हार्दिक आभार व्यक्त करती हुं ।
- कर्ता परिचय :
इस कृति की 13वी गाथा से, कर्ता का नाम मूलचंद विदित होता है।
जैन परंपरा मे मूलचंद नाम से कई प्रमुख व्यक्तित्व हुए है, जिन्होंने जैन साहित्य और भजनों की रचना की है। गुजराती साहित्य कोश (पेज न. 321) से “रीषभदेव बारमासा” के कवि के बारे मे विशेष जानकारी मिलती है। ये प्रसिद्ध कवि श्रावक शेठ मूलचंदजी हैं, जो धुलेव (केसरियाजी) के निवासी थे। उनका समय 19वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है।
श्री मूलचंदजी की अन्य रचनाएँ :
1) अजितनाथ चरित – स्तवन (2) अजितविनति
3) ऋषभदेव प्रभुनी आरती – अत्यंत प्रसिद्ध रचना, यह आरती प्रतिदिन प्रत्येक जैन मंदिर मे गाई जाती है।
4) ऋषभजिन स्तवन (5) नेमिनाथना सात वार (6) रुषभदेवजी नो छंद आदि
- कृति परिचय :
जैन श्रावक कवि शेठ मूलचंदजी द्वारा रचित “रीषभदेव बारमासा“ में साल के सभी 12 महीनों – कारतक, मागसर आदि महीनों के प्राकृतिक बदलावों एवं विशेषता के माध्यम से भगवान ऋषभदेव की भक्ति को जोड़ लिया है।
सर्वप्रथम गाथा में नगर धुलेव का उल्लेख किया है, जो आज का केसरियाजी तीर्थ है।
पाँचवी गाथा में महा (माह) महीने मे वसंत ऋतु के आगमन को बताया है और समस्त सृष्टि प्रभु भक्ति में मोरली बजा रही है, अर्थात प्रसन्न है।
नौवीं गाथा में जेठ महीने में होने वाले वर्षा के आगमन को भी प्रभु भक्ति से जोड़ लिया है। कहते है, बादल प्रभु का शीतल जल से प्रक्षाल करने योजनों दूर से प्रवास करके धुलेव नगर में आ रहे है। कविकी यह कल्पना कृतिकों और भाववाही बनाती है।
इस प्रकार प्रत्येक महीने को प्रभु भक्ति के साथ जोड़कर सुंदर “रीषभदेव बारमासा” की रचना हुई है।
- प्रभु ऋषभदेव का संक्षिप्त परिचय :
ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर और ईक्ष्वाकु वंश के प्रथम राजा थे। उन्हें भारतीय परंपरा में “आदिनाथ” के नाम से भी जाना जाता है। उनके पिता राजा नाभिराज तथा माता मरुदेवी थे। भगवान ऋषभदेव का समय युगलिक युग (जहाँ मनुष्य जोड़ों में जन्म लेते थे।) के अंत और कर्मभूमि के प्रारंभ के संधिकाल में हुआ था। युगलिक काल में मनुष्यों की सभी आवश्यकताएँ कल्पवृक्षों से पुरी होती थीं, लेकिन कालचक्र के प्रभाव से जब ये कल्पवृक्ष धीरे-धीरे समाप्त होने लगे, तब लोगों में संसाधनों की आवश्यकता होने लगी । भगवान ऋषभदेव ने असी, मसि,कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य (षट्कर्म) का ज्ञान देकर कर्मभूमि की नींव रखी।
ऋषभदेव की दो पत्नियाँ थीं—सुनंदा और सुमंगला। उनकी दो पुत्रियाँ – ब्राह्मी और सुंदरी थीं, जिनसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि और अंक विद्या का आरंभ माना जाता है। उनके 100 पुत्रों में भरत चक्रवर्ती और बाहुबली प्रसिद्ध हैं। सम्राट भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम “भारत” पड़ा।
ऋषभदेव ने लंबे समय न्यायपूर्वक शासन किया और अंत में वैराग्य धारण किया, दीक्षा अंगीकार की और कठिन तपस्या में लीन हो गए। केवल ज्ञान को प्राप्त कर तीर्थ स्थापना की। इस प्रकार वे प्रथम त्यागी व केवलज्ञानी भी बने।
श्रीमद्भागवत पुराण में भी महान योगी के रूप मे उनका उल्लेख मिलता है। वे अहिंसा, संयम, आत्म-कल्याण और त्याग के महान प्रतीक माने जाते हैं।
मूल रचना:
|| भले मींडु ||
श्री गणेसाय नमः
प्रथम जनेंसर प्रणमु पाय, जनने मरूदेवा जाया रे |
नगरे धुलेंवें1 रीखव राय रे, जगत गरू जिनवरनें नमीयें |
वीषय कषांय कपट तजीय रे, जगत गरू जिनवर नमीयें ||१||
कारतके कसरीयो2 मलसें, जनम जनम दुख टलसें |
माहारा मनवीछीत फलसें, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||२||
मगसरें मन मोहो माहारू, अमरत दरसण होयें ताहरूं |
सुरत पर वारोवार वारूं, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||३||
पोसें प्रीतडली पालो, त्रण भवन मंह अजुयालो |
तुं छें दिन तणो देयालुं रे, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||४||
माहों पचमी दिन आवें, मोरली सको3 वजावें |
गुंणल4 राग वसेंत गावें रें, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||५||
फागण फाग रांमु5 तमसुं, आदे जनआंत6 नें अमसुं |
नाटक करसुं नीतनवसुं, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||६||
चइत्रर चीत लागुं चरणें, फुल गलाब मगट7 भरऐं |
तरवु तारणनें तरणे, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||७||
वीइसाखें फुल वनरायइी(ई), त्रीजल8 तेवारें आयें |
सांमलीयो साची सग्गइी(ई), जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||८||
जेठ जोजन वर आवें, सीतल जल लेंइी(ई) नवरावें |
पांषो करतां पून पावें, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||९||
आसाढें मेघ धणा गाजें, मली धुन मृदगनें वाजें |
अेंनें दरबार सादा9 छाजें, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||१०||
सरावण सरवथी सारो, मोर बापीयो10 दादुर11 पारो12 |
गुंणअल गावें मलारो13 , जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||११||
भदरवें भवीक रें भगति, पजुसण परब14 तणी जुगती15 |
आंगी रचावें भली भगति, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||१२||
आसो पूरी छें आसा, देवाली16 परब दीपक थासां |
गुण गाया रीखव दासा, जगत गरू जिनवरनें नमीयें ||१३||
बारमास करू सेवा, मूलचंद मागें ऐं मेवा |
देजो देव तणी सेवा, जगत गरू जिनवर वदीयें ||
विषें कषाय कपट तजी रे, जगति गरू जिनवरने नमीयें ||
इति रीखव देव बारमास संमपूर्ण
शब्दार्थ :
1) धुलेंवें = केसरयाजी तीर्थ
2) कसरीयो = केसरियो = केसरयाजी तीर्थाधिपती श्री ऋषभदेव
3) सको = सकौ = समस्त, सब
4) गुंणल = गुणीयल
5) रांमु = रमीसु (?)
6) जनआंत = प्रदेश, एकान्त स्थान – जहा कोइ मनुष्य नही हो
7) मगट = मुगट
8) त्रीजल = अक्षय तृतीया का त्योहार(?)
9) सादा = साद, आवाज
10) बापीयो = पपीहा, एक पक्षी
11) दादुर = मेंढक
12) पारो = पार, किनारो
13) मलारो = राग मल्हार
14) परब = पर्व
15) जुगती = विधि, योग्य
16) देवाली = दिवाली





