बाज़ार में हर तरफ़ चहल-पहल, शोर-शराबा और आवाज़ें थीं। और होती भी क्यों न? आज रविवार का दिन था। सभी लोग साप्ताहिक बाज़ार में ख़रीदारी के लिए बाहर निकले हुए थे। अदनान भी अपने पिता के साथ राशन और घर का दूसरा सामान ख़रीदने के लिए बाज़ार आया हुआ था।
उसके पिता एक सब्ज़ी वाले से सब्ज़ियाँ ख़रीदने में व्यस्त थे कि तभी अदनान को पीछे से पक्षियों की आवाज़ें सुनाई दीं—’चीं-चीं, टें-टें…’
अदनान ने मुड़कर देखा तो कुछ ही दूरी पर एक बड़े से पिंजरे में तरह-तरह के पक्षी क़ैद थे और दुकानदार ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगा रहा था, “रंग-बिरंगे पक्षी ले लो, रंग-बिरंगे पक्षी! पच्चास रुपये का एक पक्षी… सौ रुपये का जोड़ा! कोई भी पक्षी लो, सौ रुपये का जोड़ा! लव बर्ड्स का जोड़ा सौ रुपये, तोतों का जोड़ा सौ रुपये!”
इतने सुंदर पक्षी देखकर अदनान खुद को रोक नहीं पाया। वह अपने पिता का हाथ खींचते हुए बोला, “अब्बू, मुझे पक्षी चाहिए!” “बेटा, किन पक्षियों की बात कर रहे हो?” पिता ने पूछा। अदनान ने उंगली उठाकर पक्षी वाले की तरफ़ इशारा किया। पिता ने कहा, “बेटा! हम पक्षी नहीं ख़रीदेंगे।” लेकिन अदनान ज़िद पर अड़ गया। वह बोला, “अब्बू, अगर आप मेरे लिए पक्षी नहीं ख़रीदेंगे तो मैं यहाँ से बिल्कुल नहीं जाऊँगा। मुझे पक्षी चाहिए मतलब चाहिए!”
अदनान के पिता ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। आख़िरकार मजबूर होकर पिता पक्षी वाले के पास पहुँचे। उन्होंने देखा कि पिंजरे में बहुत सारे पक्षी थे। पक्षी बेचने वाला बहुत चालाक भी था; उसने पक्षियों के साथ-साथ पिंजरे भी बेचने के लिए रखे थे। यानी वह जानता था कि जो लोग पक्षी ख़रीदेंगे, उन्हें उन्हें रखने के लिए पिंजरों की भी ज़रूरत होगी—एक तीर से दो शिकार! पक्षी बेचने के साथ ग्राहक पिंजरा भी ख़रीद लेता, यानी दोगुना मुनाफ़ा!
ख़ैर, अदनान के पिता ने एक पिंजरा ख़रीद लिया। उसमें रखने के लिए तोतों के दो जोड़े और लव बर्ड्स के दो जोड़े ख़रीदे गए। पिंजरा इतना बड़ा ज़रूर था कि उसमें चारों जोड़े आराम से आ सकते थे। अदनान ख़ुशी के मारे बाज़ार में ही पक्षियों के साथ खेलने लगा।
जल्दी ही वे दोनों घर पहुँच गए। अब क्या था! जो घर पहले शांत रहता था, पक्षियों के आने से वहाँ शोर-शराबा होने लगा। अदनान पक्षियों के नख़रे उठाने लगा—कभी उन्हें प्याज़ खिलाई जा रही है, कभी मिर्च, कभी टमाटर काटकर डाले जा रहे हैं, तो कभी उनकी चोंच के आगे सब्ज़ियाँ लहराई जा रही हैं।
“ले तोते, मिर्च खा! ले पक्षी, टमाटर खा!” दाना भी डाला गया और पानी के लिए पिंजरे के अंदर एक छोटी सी कटोरी रख दी गई। पक्षियों की झिझक देखकर अदनान ने सोचा कि शायद वे डर रहे हैं।
तीन दिन बाद पंद्रह अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस था। अदनान ने अपने स्कूल के एक नाटक में हिस्सा लिया था, इसलिए घर पर उसकी तैयारी भी चलती रहती। इस दौरान अदनान के दोस्त भी पक्षियों को देखने और उनके साथ खेलने आते रहे। वे भी अपने साथ कुछ न कुछ खाने को लाते, लेकिन पक्षी सिर्फ़ उतना ही खाते जितनी उन्हें ज़रूरत होती; बाक़ी की तरफ़ मुड़कर भी न देखते। पक्षी पिंजरे में अक्सर ख़ामोश ही नज़र आते थे।
स्वतंत्रता दिवस के दिन अदनान अपनी स्कूल की वर्दी पहनकर कार्यक्रम में पहुँचा। उसने नाटक के लिए कपड़े बदले, नाटक में भाग लिया और फिर दो-तीन घंटे तक जब तक कार्यक्रम चला, वहीं बैठा रहा। नाटक, भाषण और कविताएँ प्रस्तुत की गईं जिनमें भारत की आज़ादी की कहानी और इतिहास था। अदनान सब कुछ ध्यान से सुनता रहा; न जाने उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था। वह घर से हाथ में तिरंगा लहराते हुए स्कूल गया था और अब वही तिरंगा लहराते हुए घर लौट रहा था, लेकिन इस बार वह कुछ गंभीर लग रहा था।
घर पहुँचकर उसने सबको सलाम किया और माँ से पूछा, “अम्मी! मेरे पक्षी कैसे हैं?” माँ ने कहा, “बेटा, वे वैसे ही हैं जैसे तुम उन्हें छोड़ गए थे।”
अदनान पक्षियों के पास पहुँचा और कुछ देर तक उन्हें ध्यान से देखता रहा। उनके चेहरों पर छाई उदासी उसे बेचैन कर रही थी। आज उसने स्कूल में स्वतंत्रता दिवस के समारोह में जो कुछ सुना था, वह उसके मन में घूम रहा था। फिर अचानक जैसे उसने कोई फ़ैसला कर लिया—उसने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया!
लेकिन यह क्या? दरवाज़ा खोलने के बाद भी काफी देर तक पक्षी बाहर नहीं निकले। फिर एक तोते ने हिम्मत की और बाहर निकला। उसके तुरंत बाद दूसरा भी बाहर आया। फिर तोतों का दूसरा जोड़ा भी ‘टें-टें’ करते हुए फुर्र से उड़ गया। हालाँकि, लव बर्ड्स काफी देर तक अंदर ही रहे।
तोते पिंजरे में भी ‘टें-टें’ करते थे, लेकिन उड़ते समय जो आवाज़ वे निकाल रहे थे, वह पिंजरे वाली आवाज़ से बिल्कुल अलग थी। ऐसा लग रहा था मानो तोते भी आज़ादी का जश्न मना रहे हों।







