अचानक गिरी आकाशीय बिजली की मानिंद कड़कड़ाहट और आँखों के सामने नाच उठे सितारों ने मेरे दिमाग के चैन से बैठे अनगिनत न्यूरॉन्स में अजब सी हलचल मचा दी। धमाकेदार फ्यूजन से निकली भारी मात्रा में एनर्जी, दूसरे विश्व युद्ध में लिटिल बॉय के हिरोशिमा शहर पर गिरने से निकलने वाली रेडिएशन की ही तरह, मेरे चेहरे पर बाईं गाल को जलाकर वहीं चिपकी रह गई। बाप रे, कौन सी बला थी यह? एक बारह साल के बच्चे के तौर पर, मैं इस अचानक से मिले जोरदार झटके से बुरी तरह भौंचक्का रह गया था – क्योंकि कुछ पल ही पहले तो मैंने टीचर की पड़ताल के लिए उन्हें अपनी हिंदी राइटिंग की नोटबुक के ताज़ा पन्ने दिखाए थे, जो मेरे हिसाब से गर्व से फैले मेरी खूबसूरत लिखावट की अपनी तरफ से तारीफ कर रहे थे मानो वे मेरी खुद की प्रमाणित काबिलियत पर गर्व कर रहे हों।
किसी फटे ज्वालामुखी के झटके सरीखे कंपन कम होने के कई मिनट बाद मेरा दिमाग इतना शांत हो पाया कि वह उस राज़ को समझ सके जो एक हमदर्द क्लासमेट ने मेरे कान में फूंका था यह बता कर कि यह चांटा इसलिए पड़ा था क्योंकि एक दूसरे थोड़े से कम हमदर्द क्लासमेट ने टीचर से मेरी अभी-अभी शिकायत की थी कि मैं चालाकी से रोज़ एक ही लेख को लगातार कॉपी करके उनसे शाबाशी बटोर रहा था, हालांकि मेरे लाख ढूँढे उस शिकायती टट्टू से मेरे दूर-दूर तक के किसी छतीस के आँकड़े का सुराग मुझे नहीं मिला।
जिस शॉर्टकट के लिए पंडित जी- हमारे हिंदी टीचर-ने मुझे कट शॉर्ट किया था, उसी नकलची आदत ने मेरी लिखावट को खूबसूरत तो बना ही दिया था भले ही मैं भाषा के फोनेटिक नियमों से कई और दशकों तक अनजान ही बना रहा। मेरा कलात्मक दिमाग हमेशा यही तय करने में लगा रहता था कि किसी अक्षर के किस तरफ मात्रा का निशान दिखने में अच्छा लगेगा।
समाचार पत्रों में कर्नल पॉल टिबेट्स का हालिया ज़िक्र, जिन्होंने 1945 में लिटिल बॉय नाम के ऐटम बम्ब को हिरोशिमा में गिराया था, मुझे पंडित जी और उनके द्वारा मुझ पर उस दिन गिराए मिलते-जुलते बम्ब की बरबस याद दिला गया जब मैं पंजाब के कपूरथला शहर में मथुरादास सनातन धर्म स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ता था।
स्कूल में टीचर के इलावा पंडित जी शहर के इकलौते हनुमान मंदिर में स्थायी पुजारी भी थे। हालांकि, उन दिनों मेरे बच्चे वाले कच्चे दिमाग में यह जानने की उत्सुकता कभी नहीं हुई कि उनके उन दोनों नेक पेशों में से कौन सा पार्ट-टाइम था और कौन सा फुल टाइम, बेशक उनका हमें अक्सर क्लासरूम से निकालकर स्कूल के अंदर बने मंदिर के चबूतरे पर ले जाना और सफेद संगमरमर के फर्श पर बिठाकर सुंदर लिखावट का अभ्यास करवाना बाद में मुझे इस बारे में काफी संकेत देता रहा जिन्हें नज़र-अंदाज करने को ही नादानी कहते हैं यह बहुत बाद में समझ आया। हम सीधे-सादे बच्चे इसे बस उनकी दोपहर की नींद के लिए पीपल के पेड़ की छाया में, हवा में सरसराते, लोरी गाते पत्तों के साथ रोज़ मुलाकात करने की इच्छा भर ही समझते रहे। इस संदर्भ में यह भी समझने वाली बात थी कि हमारे कच्चे दिमागों के लिए उनमें कितनी दया भरी थी, कि उन्होंने हम पर समय से पहले गद्य, पद्य और व्याकरण की जटिल बारीकियों का बोझ डालना उचित नहीं समझा, जिसके लिए शिक्षा विभाग ने गलती से या किसी संदिग्ध, क्रूर इरादे से पाठ्य-क्रम की मोटी-मोटी किताबों का एक बंडल तैयार किया था और उन्होंने यूं हमेशा इस बात पर बल दिया कि हम पहले अपनी लिखावट पर ध्यान दें, लिखना क्या है उसकी बेवजह अभी से चिंता न करें और न ही उन किताबों की जिन्हें खरीदा तो गया पर खोलने का मुहूर्त साल भर न निकला।
अपने गुरु के प्रति सम्मान में, आध्यात्मिक रूप से या बस उन्हें रोज़ाना चढ़ाए जाने वाले प्रसाद का एक बड़ा हिस्सा ग्रहण कर, पंडित जी ने बजरंगबली के कई शारीरिक गुण खुद में धारण कर लिए थे। अपने गोल-मटोल, सांता क्लॉज़ जैसे शरीर और ओवरटाइम ड्यूटी पर उसमें तैनात नसों में धड़कती मज़बूती और लाल गुब्बारे जैसे फूले गालों से झलकती सेहत के साथ, उन्हें उतने ही मोटे-मोटे हाथ भी मिले थे, जिनके द्वारा मेरे गाल पर छोड़े गहरे निशान मेरे घर के आईने में कई दिनों तक मुझे मुँह चिड़ाते रहे। अगर पंडित जी को अपने भगवान के चरणों में बैठने की ड्यूटी न मिली होती, और भौतिकी के उस नियम को किसी तरह झुठलाया जा सकता जिसके अनुसार किसी पदार्थ को एक समय में एक ही स्थान पर विराजमान रहने की मजबूरी होती है, तो बजरंगबली की गदा और लाल गुलाल की थोड़ी सी करामात के साथ, अपने सभी उन खास शारीरिक गुणों के कारण, पंडित जी बड़ी आसानी से खुद भगवान हनुमान का अवतार बन भक्तों की इच्छा अनुसार जगह-जगह अवतरित हो उन्हें धन्य कर सकते थे।
बचपन के उन दिनों को गए इतने साल बीत गए हैं, लेकिन पंडित जी की गुदगुदाती यादें आज भी मन में बसी हुई हैं, क्योंकि क्लास में एक धोखेबाज़ लड़के के प्रति उन्हें जो कड़वी निष्पक्षता उस दिन दिखानी पड़ी थी, उसके बावजूद मैं हनुमान मंदिर पर उनके पुजारी रूप के समक्ष वही पसंदीदा छोटा भक्त बना रहा और हर मंगलवार शाम वहाँ से दूसरे भक्तों के मुकाबले में उन्हीं मोटे-मोटे हाथों की मुट्ठियाँ भर-भर बर्फ़ी और बूंदी का प्रसाद ग्रहण कर घर लौटा करता।







