अनशन
शरीर की नहीं,
व्यवस्था की परीक्षा होता है।
प्रश्न यह नहीं कि
कौन कितना भूखा रहा,
प्रश्न यह है कि
किसने
कितनी देर तक
सुनना टाल दिया।
भूख
जब रोटी से आगे बढ़ जाती है,
तब
वह पेट में नहीं,
समय के अंतःकरण में
जलती है।
एक मनुष्य
अपने हिस्से का अन्न छोड़ देता है,
ताकि
किसी दिन
किसी और के हिस्से का न्याय
बच सके।
अनशन
पराजित मनुष्य का
हथियार नहीं,
उसका अंतिम विश्वास होता है-
कि
शब्द अभी पूरी तरह मरे नहीं हैं।
जिस दिन
सत्ता
भूखे मनुष्य से
डरना छोड़ दे,
उस दिन
लोकतंत्र
अपने सबसे कठिन प्रश्न के सामने
खड़ा होता है।
क्योंकि
अनशन
रोटी के विरुद्ध नहीं,
उपेक्षा के विरुद्ध होता है।
और
इतिहास गवाह है-
जब-जब
भूख ने
बोलना शुरू किया है,
तब-तब
सभ्यताओं को
अपने ही विवेक का
उत्तर देना पड़ा है।





