क्रोशिये पर पहला फंदा डालते ही
मम्मी मानो सिर्फ ऊन नहीं,
हमारी समझ, हमारा धैर्य,
हमारी जड़ें बुनती रहती!
एक फंदा सीधा एक फंदा उल्टा…
यह कोई टेक्नीक नहीं
जीवन का पहला पाठ था
कि सीधा और उल्टा को मिलाकर ही
स्वेटर बुना जाता,
ठीक इसी तरह परिवार भी बनता!
घर के कामों से थककर भी
जब मम्मी स्वेटर बुनने बैठतीं
तब उनके चेहरे पर
एक अजीब-सी संतोष होती
क्योंकि उस समय
उनके हाथों में कोई मेहनत वाला
काम नहीं,
सृजन का सुख होता था,
जिसके साथ एक मन का लगाव था!
यू ट्यूब में डिज़ाइनों को
देखकर हूबहू बना लेना
मम्मी के बाएँ हाथ का खेल बन गया
मानो यह उनकी कोई विरासत थी
जो चुपचाप चलती चली जा रही है
बिना किसी प्रमाणपत्र, डिग्री,मैडल के
बस चलती ही जा रही है
ऐसा लगता मानो
समय बदलने के साथ
ऊँची पढ़ाई के साथ-साथ
जो दादी,नानी के बाद
मम्मी तक ही सीमित रही,
हुनर जब हाथों में नहीं,
दिल में बसता है
तब वह “जादू” कहलाता है।






