आपने भी नोटिस लिया होगा कि सेठों के बेटे की शादी में बस नाम बेटे का होता है बाकी पटकथा में बेटे के लिये कोई गुंजाईश नही होती | रस्म के हर दृश्य में बाप ही छाया रहता है | यह पूरी तरह एक पात्रीय प्रस्तुति होती है | बेटे की शादी बाप के जीवन का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता है | बेटे को तो स्टेज की सीमा में कैद कर पूरी शादी में बाप ही बाप नज़र आता है |
शहर में ऐसी शादियाँ होती ही रहती हैं जिसमें जाओ तो ऐसा लगता है शादी में भव्यता नही रखी गई है , भव्यता में शादी को रख दिया गया है | वहां शादी गौण और भव्यता मुख्य लगती है | आमंत्रित लोग भी पहले भव्यता का मुआयना करते हैं , फिर भोजन के स्टालों का निरीक्षण कर महिलाओं के कपड़े , मेकअप और ज्वेलरी देख कुल खर्चे का आंकलन करने के बाद दूल्हे के बाप से मिलते है , उसके गले लगते हैं , व्यवस्था की रटी रटाई प्रशंसा करते हैं और अंत में जाते जाते दूल्हे से भी मिल लेते हैं |
मकसद ब्याहना नही दिखाना था | गरीबों और इर्ष्यालू लोगों को चुन चुन कर आमंत्रित किया जाता है कि “देखो” | याद कर कर के बड़े लोगों को कार्ड भेजा जाता है कि देखो हम भी तुम से कम नही है | कार्ड हाथ में लेते ही लोग उसकी कीमत का अनुमान लगाने बैठ जाते हैं | इसके साथ ही योजनाबद्ध तरीके से चंद लोगो की उपेक्षा भी की जाती है ताकि शादी की चर्चा बस वे ही लोग न करें जो आये थे बल्कि उन महफ़िल में भी शादी की बात हो जिन्हें बुलाया जाना था पर नही बुलाये गये | कहीं कहीं तो दो लिस्ट बनती है पहली उनकी जिन्हें बुलाना है और दूसरी उनकी जिन्हें नही बुलाना है | कभी कभी इधर की लिस्ट उधर की हो जाती है , तब बाप का हंगामा भी याद रखने लायक होता है |
बेटे की शादी में बाप जो दावत का इंतज़ाम करता है जिसे दुनियां रिसेप्शन कहती है दरअसल वह नुमाइश होती है जहां हर स्टाल पर खाद्य सामग्री के रूप में हैसियत रखी होती है | अपनी प्रशंसा सुनने बाप एक एक मेहमान से व्यक्तिगत रूप से मिलता है , झुक झुक कर उनके आने का शुक्रिया अदा करता है और अच्छे से खाने का निवेदन करने के साथ ही गलती , कमी और असुविधा के लिये क्षमा भी मांगता है | कमी के लिये वही क्षमा मानते हैं जिन्हें मालूम होता है कि हमने कोई कमी नही रखी है | यह वैसा ही है जैसे हिस्से बटवारे के समय वही लोग कागज़ दिखाओ बोलते हैं जिन्हें मालूम है कि कागज़ नही है |
रिसेप्शन में तरह तरह के लोग जमा होते हैं | यह प्रोग्राम अलग अलग विचारधारा के लोगों को एक साथ खड़ा करता है | यहाँ विपरीत विचारधारा के लोग एक साथ खाते हुए मिलेगे | जब बात खाने की आती है तब विचारधारा लुप्त हो जाती है , यह चिड़िया पेट में दाना जाने के बाद ही चहकती है | इस पार्टी में एक से बढ़ कर एक प्रतिभावान लोग मौजूद होते है | खाने के बाद खाने की प्रशंसा करना समझ आता है लेकिन वहाँ खाना खाये बिना ही खाने की प्रशंसा करने वाले लोग भी होते है | जिन्होंने खाया है उनसे ज़्यादा खाना उन्हें पसंद आता है जिन्होंने खाया नही है |
बेटे की शादी …. यह बाप द्धारा लिखित नाटक है जिसमें शब्द नही बस दृश्य ही दृश्य होते है | बेहतरीन मंच सज्जा , आकर्षक वेश भूषा , मन मोहक प्रकाश व्यवस्था और संगीत से सजी यह नाट्य प्रस्तुति सबका मन मोह लेती है | प्रस्तुति में शब्द नही होते लेकिन उसकी समीक्षा में सप्ताह भर शहर की हर दिशा में शब्द ही शब्द होते है | इस नाटक में बाप का अभिनय यादगार बन जाता है |
बेटे की शादी में बाप का रिच लुक उभर कर आता है | इसी लुक के प्रदर्शन के लिये ही तो बेटे की शादी की गई वरना अभी बेटे की शादी की उम्र ही नही थी |
अपने शहर में क्या नही फिर भी शादी में बजाने वाले , पकाने वाले , सजाने वाले दूसरे शहर से बुलाये जाते हैं | इनकी ख़ासियत यह होती है कि ये दूसरे शहर से आये हैं | यह परंपरा है कि दंगे में बाहर से गुंडे और शादी में बाहर से मुंडे मंगवाए जाते है , यह स्थानीय प्रतिभाओं की उपेक्षा का मामला है |
बैंड पार्टी को देख दूल्हे का बाप सैक्सोफ़ोन बजाने के लिये मचल जाता है , उसका बस चलता तो बेटे के बदले घोड़ी पर वही बैठता | वह तो दूल्हे की माँ ने आँख दिखा दी तो रुक गया वरना बाप के अंग तो भांगड़ा करने के लिये थिरक रहे थे | उसके भांजे तो कह ही देते हैं कि मामा दूल्हे तो आप ही लग रहे हो |
बरात तो भव्य होती ही है | न थकने वाले लड़कों के नागिन डांस से सुसज्जित बरात सीधे ब्याह स्थल पर पहुची तो फिर वह बरात भी कोई बरात है | इस बात पर बाप पैसा और पावर झोक देता है और बरात प्रतिबंधित मार्ग से निकालने की अनुमति ले आता है | चारो दिशाओं का ट्राफ़िक जाम और लोगों को परेशान कर उनके बीच बरात ऐसे चलती है जैसे बत्तीस दांतों के बीच ज़बान |
शादी जीवन की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है | शादी को ख़तरा मानने वाले लोग भी है | उन्हें यह समझना होगा कि शादी का ख़तरा न उठाना उससे भी बड़ा ख़तरा मोल लेना है | शादी से जीवन को आकार मिलता है | यह रिश्ता बाहर से नाज़ुक अंदर से मज़बूत होता है | इससे घर की वायु प्रदूषित नही होती है | शादी एक आशावादी कदम है |
करोड़ो रूपये की यह चार दिन चलने वाली शादी भी दो दिन में भुला दी जाती है | बेटा बहू संस्कारी हैं तो बिना ताम झाम वाली शादी भी सफ़ल होती है वरना करोड़ो की शादी भी दो कौड़ी की साबित होती है | महंगी से महंगी शादी में भी तलाक की संभावना शून्य नही होती | शादी के पवित्र बंधन की गर्दन पर तीन तलाक और तलाक ए हसन की लटक रही तलवार को हटाये बिना कोई भी शादी सुरक्षित नही है | नये श्रम कानून की तरह नये विवाह कानून भी ज़रूरी है |







