नगर के एक संस्थागत सेमिनार हॉल में—जहाँ एसी और नैतिकता, दोनों ही अवसरानुकूल चालू-बंद होते रहते थे—इस वर्ष “अखिल भारतीय चिरकुट साहित्यिक पत्रिका संपादक समागम” का द्विदिवसीय भव्य, या कहें कि ‘भाव्य’ आयोजन, कुछ बड़ी संस्थाओं के आर्थिक अनुग्रह से संपन्न हुआ।
प्रवेश द्वार पर एक पुरानी पत्रिका का फीका पड़ चुका फ्लेक्स, कुछ धर्मशास्त्रीय उद्धरण, और बीच में प्रायोजकों के चमकते लोगो इस प्रकार सजे थे मानो लक्ष्मी और सरस्वती ने अंततः शास्त्रार्थ त्यागकर गठबंधन सरकार बना ली हो।
ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—“साहित्य साधना का महाकुंभ”
और भीतर प्रवेश करते ही स्पष्ट हो जाता था कि यह साधना कम, साधन-संपन्नता का कुंभ अधिक है।
उद्घाटन दीप प्रज्वलन से हुआ। पाँच संपादकों ने मिलकर दीप जलाया—दृश्य ऐसा था मानो पांडव पुनर्जन्म लेकर लौट आए हों; अंतर केवल इतना था कि इनका कुरुक्षेत्र अब हस्तिनापुर नहीं, विज्ञापन विभाग था।
सरस्वती वंदना के उपरांत संयोजक महोदय ने अतिथियों का परिचय देते हुए इतना लंबा नैतिक भाषण दिया कि लगा जैसे मनुस्मृति का परिशिष्ट ही वाचन हो रहा हो—बस अंतर इतना था कि उसमें वर्ण-व्यवस्था के स्थान पर ‘संपादक-व्यवस्था’ का सूक्ष्म वर्गीकरण स्थापित किया गया था। पुष्पगुच्छ, नारियल, शॉल और मेमेंटो के आदान-प्रदान के बाद उपदेशों की गंगा प्रवाहित हुई।
मुख्य वक्ता—जो स्वयं एक उच्च पदस्थ अधिकारी भी थे—ने माइक संभालते ही उद्घोष किया—“मित्रों, आज साहित्य नहीं, उसकी अर्थव्यवस्था संकट में है।”
सभी ने श्रद्धा से सिर झुका लिया—मानो यह वाक्य किसी लुप्त वेद शाखा से अभी-अभी प्रकट हुआ हो।
प्रथम दिवस
पहला सत्र: पत्रिका और लक्ष्मीप्राप्ति के आधुनिक मार्ग
यह सत्र वस्तुतः यज्ञ की आधुनिक विधि का पुनर्लेखन था—जहाँ आहुति की जगह ‘प्रस्ताव’ और देवताओं की जगह ‘प्रायोजक’ प्रतिष्ठित थे।
एक संपादक ने स्लाइड दिखाते हुए कहा—
“हमारी पत्रिका अब ‘कंटेंट’ नहीं, ‘कर्मकांड’ है। जैसे यज्ञ में आहुति दी जाती है, वैसे ही हम CSR फंडिंग में प्रस्ताव अर्पित करते हैं।”
दूसरे ने जोड़ा—
“सरकारी विज्ञापन ही आज का गायत्री मंत्र है—जितना जपिए, उतना फल।”
तीसरे ने गंभीरता से कहा—
“हमने सार्वजनिक उपक्रमों को ‘दानवीर कर्ण’ मान लिया है—बस कवच-कुंडल की जगह विज्ञापन चाहिए।”
पीछे बैठे एक बूढ़े कवि ने धीमे से पूछा—
“तो साहित्य?”
उत्तर आया—
“वह भी है… पर ‘आहुति’ के रूप में।”
दूसरा सत्र: मार्केटिंग, तकनीक और डिजिटल धर्म
यहाँ एक युवा संपादक—स्वयंभू “डिजिटल ऋषि”—ने घोषणा की—
“अब कविता नहीं, ‘रील’ ही नई रामायण है—हर श्लोक 30 सेकंड में पूर्ण।”
दूसरे ने मोबाइल लहराते हुए कहा—
“हमारा ऐप है—डाउनलोड कोई नहीं करता, पर निवेशक इसे ‘आधुनिक वेद’ मानते हैं।”
तीसरे ने गर्व से बताया—
“हम एआई से कविताएँ बनवा रहे हैं—अब लेखक की आवश्यकता नहीं… जैसे मनुस्मृति में सब पूर्वनिर्धारित है।”
हॉल में ठहाका गूँजा—कुछ ने इसे व्यंग्य समझा, कुछ ने नीति।
दोपहर: भोजन और भावनाओं का समागम
भोजन में चपातियाँ, सब्जी, रायता और संभावनाएँ साथ-साथ परोसी गईं।
एक टेबल पर चर्चा थी—“किस मंत्रालय से अनुदान मिल सकता है?”
दूसरी पर—“कौन-सा ट्रस्ट अधिक उदार है?”
एक संपादक ने रहस्य खोला—“हमने रामायण विशेषांक निकाला—कुछ द्वार अपने आप खुल गए।”
दूसरे ने मुस्कुराकर कहा—“हमने महाभारत पर बहस छेड़ी—अब हर पक्ष हमें अपना मानता है।”
तीसरे ने जोड़ा—“हम मनुस्मृति का संदर्भ भी दे देते हैं—जिसे जो रुचिकर लगे, वही ग्रहण कर ले।”
तीनों ने संतोष से एक-दूसरे को देखा—यह उनका ‘संपादकीय धर्मशास्त्र’ था।
तीसरा सत्र: साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रधर्म
यह सबसे गंभीर सत्र था—क्योंकि इसमें साहित्य सबसे कम उपस्थित था।
एक संपादक बोले—“हमारी पत्रिका में संस्कृति का पूरा ध्यान रखा जाता है—हर अंक में कम से कम एक धार्मिक प्रतीक अनिवार्य है।”
दूसरे ने संतुलन साधा—“थोड़ा-सा सत्ता, थोड़ा-सा विरोध… ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में हर कोई अपने-अपने धर्म के साथ था।”
तीसरे ने निष्कर्ष दिया—“हमारी पत्रिका ही आज का नया पुराण है—जिसमें जो लिख दिया, वही सत्य।”
पीछे से एक क्षीण स्वर उठा—“और साहित्यिक चेतना?”
उत्तर आया—
“वह अंतिम अध्याय में आएगी… जब प्रायोजक मिल जाए।”
दूसरा दिन: सत्य का अनौपचारिक अनावरण
सत्र: गुटबंदी और सृजनात्मकता
एक संपादक ने गर्व से कहा—“हमारे यहाँ केवल श्रेष्ठ रचनाएँ छपती हैं—अर्थात हमारी मंडली की।”
दूसरे ने प्रतिवाद किया—“हम लोकतांत्रिक हैं—हम मित्रों के मित्रों को भी अवसर देते हैं!”
तीसरे ने नीति स्पष्ट की—“जो विरोध करे, उसे ‘अपरिपक्व’ घोषित कर देते हैं।”
तालियाँ बजीं—मानो कोई गूढ़ सूत्र उद्घाटित हुआ हो।
दोपहर: भोजन और संपादकीय द्वंद्व
एक कोने में दो संपादक फुसफुसा रहे थे—“तुमने मेरी कविता क्यों नहीं छापी?”
“तुमने मेरी समीक्षा क्यों नहीं लिखी?”
क्षण भर के लिए कुरुक्षेत्र जीवित हो उठा, फिर दोनों मुस्कुराए—
“अगले अंक में देखेंगे…”
(दोनों जानते थे—वह ‘अगला अंक’ शाश्वत प्रतीक्षा है, जैसे किसी अप्रकाशित महाकाव्य का अंतिम सर्ग।)
अंतिम सत्र: नए लेखकों का भविष्य
एक वरिष्ठ संपादक बोले—“नए लेखक बहुत अधीर हैं।”
पीछे से एक नवोदित स्वर उठा—“सर, छपने का तरीका?”
उत्तर आया—“पहले हमें पहचानो, फिर हमें मानो, फिर हमें मनाओ… उसके बाद भी कुछ निश्चित नहीं।”
हाल में एक गहरी चुप्पी फैल गई—जैसे सत्य बिना निमंत्रण के आ उपस्थित हुआ हो।
समापन: मंत्र, मिलन और मौन
समापन सत्र में सभी संपादकों ने एक स्वर में घोषणा की—“हम साहित्य की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं!”
यह वाक्य इतनी बार दोहराया गया कि वह मंत्र बन गया—जिसका अर्थ कोई नहीं जानता था, पर जप सभी कर रहे थे।
संपादक एक-दूसरे से गले मिले—मानो राम और भरत का मिलन हो—और भीतर ही भीतर सोचा—“इसकी चिरकुट पत्रिका!”
बाहर निकलते समय एक बुजुर्ग कवि—जो पूरे समय मौन साधे थे—धीरे से बोले—
“यह समागम नहीं, एक नया पुराण रचा गया है—
जहाँ देवता प्रायोजक हैं, ऋषि संपादक हैं और यज्ञ… विज्ञापन का है।”
और साहित्य?
वह कहीं कोने में बैठा था—न रामायण में, न महाभारत में, न वेदों में, न पुराणों में—
बस एक पुरानी, धूल भरी पत्रिका के पन्नों में,
अपनी बारी का इंतज़ार करता हुआ।
अगले दिन सभी प्रमुख समाचार पत्रों में इस आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा प्रकाशित हुई—
और कुछ पत्रिकाओं ने तो इसे ‘साहित्य का स्वर्णिम पुनर्जागरण’ भी घोषित कर दिया।







