बात बहुत पुरानी है। हम सात भाई-बहन थे। मेरा विवाह नम्बर दो पर हो चुका था। हालाँकि मेरे से बड़े तीन भाई थे। सिर्फ़ सबसे बड़े भाई का विवाह हो चुका था और हमारे आँखों के तारे दो भतीजे- भतीजी भी थे, फिर मेरा विवाह हुआ था।
अब दूसरे भाई की शादी का समय था। घर मेहमानों से भरा था। प्रायः सबके बनियान व कच्छे, ख़ास तौर पर पुरुषों के एक जैसे होते और जब कपड़े धुल कर सूखने के बाद कपड़ों का ढेर लग जाता था और उन्हें छाँटने की बारी आती थी। कौन सा किसका है? पता नहीं चलता था, सब को बुला- बुलाकर पूछा जाता था और बोला जाता था “अपने- अपने कपड़े ले जाओ!”
ऐसे ही एक दिन मेरी बड़ी भाभी जो क़रीब- क़रीब मेरी ही हम उम्र थी, धोबी वाला पेन लेकर बैठी( धोबी कपड़ों पर पेन से चिन्ह लगाया करता था, शायद उसके पास परमानेन्ट मार्कर होगा। भाभी के पास पेन पता नहीं, कहाँ से आया पर एक दिन वे अपने कपड़ों पर चिन्ह व नाम के प्रथम अक्षरों को लिखने बैठी। उन्हें लिखते देख मेरे पति ने उनसे चुटकी ली. “भाभी आपका ठीक है! आप अपने साथ सिर्फ़ पेन लेकर आती हो और जो कपड़ा पसन्द आया, उस पर अपने नाम का प्रथम अक्षर लिख देती हो।”
वे भी ननदोई की चुटकी पर हँस पड़ी और आगे इसी कमेंट पर बिना बुरा माने बोली, “बिल्कुल ख़ाली हाथ आती हूँ। बस यह मार्कर साथ ले आती हूँ जो पसन्द आया, जो साईज़ पति को फ़िट आया उस पर पति का नाम, रूमालों पर, जो बच्चों की बनियान पसन्द आई उस पर बच्चों का जो पेटीकोट मेरी साड़ी से मैच करता है उस पर तपाक से अपना अक्षर लिख लो —— “!
सब लोग सलज- ननदोई की नोक- झोंक पर ठट्ठा मार कर हँस पड़े।
ब्याह शादी के वातावरण में मीठी चाशनी घुल गई। वो भी ननदोई के साथ खूब नोक झोंक, हँसी मजाक करने से नहीं चूकती थी। मज़ाक़ को सपोर्टिंगली लेती थी। आज भी सलज ननदोई की वो चुटकी याद आती है तो 🤣 ऐसे वाले इमोजी वाला हाल होता है। यही बात किसी और भाभी से की होती तो वे शायद बुरा मान जाती और दृश्य कुछ और ही होता।







