1.
चाहतों का क्या,
वे तो अक्सर
वर्जनाओं के चारों ओर
अपने नंगे पाँव लेकर घूमती रहती हैं।
धीरे से कान में फुसफुसाती है,
जिसे इतने बरसों से
तस्वीर में देखते आए हो,
अगर वह किसी रात
फ्रेम से उतरकर
सचमुच तुम्हारे सामने आ खड़ी हो तो?
इस “तो” के बाद
कोई वाक्य नहीं बनता।
बस धड़कनों की स्याही फैल जाती है
पूरे मन पर।
फिर एक सुनहरी शख्सियत
सजीवीता संग उतर आती है
इतनी पास
कि देखने भर के लिए
आँखों की नहीं,
साँसों की ज़रूरत पड़ती है।
कह देता हूँ
बस यहीं, ऐसे ही थमी रहो।
पर भीतर कहीं
एक और आवाज़
खदबदाती है
….थोड़ा और पास।
और फिर से विस्पर…
अरे,…थोड़ा और।
और ऐसे हमारे बीच
जो थोड़ी-सी हवा बची रहती है,
वह भी बेचैन हो उठती है।
समय बाहर खड़ा
दरवाज़ा खटखटाता रहता है,
और हम…
अनसुना करते रहते हैं उसे।
ठहरी पलकों के नीचे
जाने कितने निमंत्रण छिपे होते हैं,
और उँगलियों में
जाने कितनी अधूरी यात्राएँ।
उस रात
कुछ भी पूरा नहीं होता,
फिर भी लगता है
जैसे एक जीवन
एक-दूसरे में रख दिया हो हमने।
और जब, ऐसे में
कंधे पर सिर रखकर
कोई चुप हो जाती हो,
तब समझ आता है…
लालसा का अंतिम अर्थ
पाना नहीं,
किसी के इतने निकट पहुँच जाना है
कि दोनों की खामोशियाँ
एक ही भाषा बोलने लगें।
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2.
वो एक आम पुरुष था,
जिम्मेदारियों की गठरी ढोता हुआ
कभी-कभी मुस्कराता
कभी निःशब्द-सा।
उसकी ज़िंदगी में
सब कुछ था
समर्पण, समझौते, स्थिरता।
फिर भी, भीड़ में कभी-कभार
कोई सामान्य-सी स्त्री
बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कॉलोनी के पार्क में
रोज़ टहलती परिचित-सी अपरिचिता
ठहर जाती थी उसकी आँखों में
बिना किसी कारण,
बिना किसी आमंत्रण।
ना कोई योजना थी,
ना चाहत,
ना ही कोई नीयत।
बस कुछ पल की बातें
कुछ मुस्कानों की अदला-बदली
और दोनों एक-दूजे की हँसी में
हल्का-सा पिघल जाते।
फिर भी कुछ था
उद्दाम आकर्षण का वेग सा
बिन बुलाए पास आ बैठता,
जैसे कोई भूला हुआ सुर
कानों के पीछे अचानक गूंज उठे।
ना प्रेम था,
ना कोई इरादा।
बस संवाद की चाह ने
बुन ली कुछ नज़दीकियाँ
कि वो एक बार देख ले,
हल्के से मुस्करा दे,
और दिन कुछ ज़्यादा सुंदर हो जाए।
उफ़…
दिल के किसी सॉफ्टवेयर ने
कुछ क्षण के लिए
उसे प्रायोरिटी विंडो में रख दिया।
तभी तो,
चाहनाएं मचल उठतीं
होंठ आभासी चुम्बन चुराते,
उंगलियाँ किसी स्मृति में
कमर पर फिसलतीं,
और आँखें,
छिपना चाहती थीं अपनी ही ख्वाहिशों से।
दिल कहता,
ये चाहत है…
ना छल, ना दोष।
बस एक अधूरी ज़रूरत,
किसी आम इंसान की।
मगर
दिमाग, संस्कारों से भरा
कह उठता,
इको करता हुआ,
गलत है न, थम जाओ!
पर
क्या करे वो?
दिल, प्रेम का सौदागर बन चुका था शायद।
और अंततः,
नज़रों ने कह ही दिया
प्रेम है… थोड़ा सा।
शायद अधूरा, शायद अस्वीकार्य,
पर हाँ,
सचमुच… प्रेम है!







