स्नेहिल नमस्कार मित्रों
दिन आते हैं, जाते हैं, सप्ताह, माह, वर्ष आते हैं और कब एक समाप्त होकर दूसरा समक्ष आ खड़ा होता है। हम गिनती करते रह जाते हैं, सोचकर दुखी होते रहते हैं कि उन दिनों हमारी उससे उस बात पर बहस हुई थी और उसने किस तरह हमसे बात की थी!हमें ऐसा लगता है जाने हमारे ऊपर कितने दुख के पहाड़ टूट गए, हम भूल जाते हैं कि हमने भी तो पहले उसके साथ कितना उपेक्षित व्यवहार किया था।अब जब उसका प्रतिकार हमें मिल रहा है, हम उससे रुष्ट हैं!
त्योहार मिलन व प्रेम के प्रतीक हैं किंतु हमने तो उन्हें दिखावे का प्रतीक बना दिया। प्रेम की भाषा भूलकर अपनी बड़ाई की भाषा में चेहरे पर एक मुखौटा ओढ लिया। परिणाम? प्रेम हवा के झौंके सा उड़ गया, बाकी सब कचरे विचार दिलोदिमाग़ में कालीन बिछाकर बैठ गए। अब भई जब सारे व्यर्थ के महानुभावों को कालीन मिलेगा तो वे सीधी-सादी चारपाई पर क्यों बैठना चाहेंगे?
अब छोटी छोटी बातों में जब दूरी होगी तो क्या बार क्या त्योहार? किसी से मिलना भी होगा तो ठसक से! विनम्रता, प्रेम के बिना रिश्ते कितने दिन बने रह सकते हैंऔर जब रिश्ते ही नहीं होंगे तब जीवन…?
सबसे जुड़े रहने के लिए आपस में प्रेम की स्नेहिल फुहार चाहिए, भरोसा चाहिए, बिछड़ने के लिए एक क्षण, गलतफहमी, ही काफ़ी है। संबंधों में लड़ाई चाहे कोई भी करे लेकिन हार किसकी होती है? हार तो आपसी रिश्ते की होती है। मन की स्लेट पर यदि प्रेम को ऐसे गाढे मार्कर से लिख लें कि धोए न धुले। अपने मन की ज़मीन पर प्रेम के बीज डालकर उन्हें सींचते,सहेजते रहें, बो लें सुगंधित रंग बिरंगे बीज, कल्पना करते हैं कैसी फ़सल लहराएगी!
एक और बात याद आई, हमारे पास एक छोटी सी चीज़ है जिसमें भरा है कसैलापन भी, मीठापन भी! जी हाँ, दोस्तों ठीक समझे… हमारी ज़बान! जो भर सकती है खून में मिठास और रिश्तों में कड़वाहट!इसलिए इसकी हरकतों पर लगातार निगरानी ज़रूरी है। जब किसी के नाम को बार बार पुकारा जाता है, तो चलो उसे मुड़कर देख लेते हैं दोस्त! क्या मालूम वह हमें क्यों मुस्कान दे रहा है? क्यों बुला रहा है?शायद प्रेम से हमें जीवन को जीना सिखाने में,हमारी अच्छे लोगों से रिश्ता जोड़े रखने में हमें और बेहतर टिप्स देना चाहता हो!
तभी तो मुझे सदा लगता है कि प्रेम कभी वृत्त में नहीं रहता। वह उड़ता है पवन के साथ! वह हर रिश्ते में जोड़ता है पक्की मीठी गाँठ!वह शुद्ध है, वही बुद्ध है!वही जीवन है, कल था आज है, कल रहेगा… हमारी अनुपस्थिति में भी प्रेमिल स्मृति के रूप में एक मुस्कान ही फैलाएगा, सबको अपना बनाने का अपना प्रयास तो करता ही रहेगा।
तो चलिए, देखते…. पुकारता कौन है, यूँ मुस्कराकर हमें, थमा रहा मशाल है हमारे हाथों में!!
आप सबकी मित्र
सस्नेह






