1. आत्मा के वस्त्र
काश!
कपड़ों से पहले बुने गए होते आचरण और नीयत के रेशे,
जिसे गूंथ ओढ़ कर कभी फिर कोई निर्लज्ज ना कहाता
पढ़ाया गया होता मानवीय संवेदन,
तो शायद कोई भी मन व्यभिचारी ना हो पाता।
गढ़े गए होते लिहाज़ और इंसानियत के मायने
तो यूं दूसरे पर कोई खुद से पहले उंगली ना उठाता
अफ़सोस पर ये हो न सका;
बस
समझाई गई जंगल की प्रवृत्ति,
बस
पढ़ाये गए व्यापार,
और
छल से जिंदा रहने की सीखी
चौसठ कलाएं और व्यवहार
यूँ जंगल से निकल आदमी ने
जंगल ही फूंके सर्वप्रथम!
रौंद डाले अपने और पराए
पाने की चाह में रिश्ते किए खतम
खड़ी कर ली अंधी बस्तियां
जन्मी गई फैक्ट्रियां
धुएं सी काली युक्तियां
खून, थूक, उल्टी,
मैले में सनी अस्थियां।
पनपी महामारी व बीमारियां
फले फूले
भ्रष्टाचारी अट्टहास व उपहास,
पनपे रोग जनित व्यापार और
संक्रमित सहवास!
क्रांतियों के भेस में
इस उस सब देस में
रचे स्वांग,षड्यंत्र,चक्रव्यूह
मृत्यु-जन्म के क्षीण क्षण में
यूँ समाप्त हुई मानवता
जन्मे गए सामाजिक नरसंहार
काश! कपड़ों से पहले
बुने गए होते आचरण और नीयत के रेशे
अफ़सोस पर ये हो ना सका।
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2. वे भी डरते हैं
उन्हें
सड़ते अनाजों की फ़ोटो से डर है,
उन्हें
डर है फंदों पर झूलते किसानों की झुलसी देह से,
उन्हें
डर है पखानों से सड़ते हस्पतालों से,
डर है
धूल सनी बंद संदूको में रखी बेरोजगारों डिग्रियों से
अख़बार में छपे सड़क के हर गड्ढे से
डर है उन्हें हक़ की हर उठती आवाज़ से
उन्हें डराती है रेप हुई बेज़ार बोलती लाशे
डराती है उन्हें सवालों की आंचें
यकीन मानो…
हस्पताल,कचहरी और पुलिस तक जाने में
केवल आम आदमी ही नही डरता
इन सबका आम आदमी तक पहुँच जाने का डर
उससे बड़ा है







