खींचता हूँ कुछ लकीरें,
जाने कहाँ से तुम आ ही जाती हो,
कितने भी गाढे हो मेरे रंग
अमृता
तुम एक बूंद बनकर छलक ही जाती हो।
सदियों से,
इतिहास बन बन के,
जाने कितने समर्पण रंगे हैं मैंने,
फिर भी
मेरी हर एक उम्र के हर एक पड़ाव की दहलीज पर
अमृता
तुम आ कर कुछ देर ठहर ही जाती हो।
बहुत कोशिश करता हूँ
दिन और रात के बीच की शाम में रंग भरने की,
दिन और रात भटकती देह से
निकल एक नज़्म बन
अमृता
तुम मेरे कैनवास का
हस्ताक्षर हो ही जाती हो।
जब जब तुम्हारी देह पर
मेरे ब्रश के स्ट्रोक्स लगते हैं,
बगैर स्याही की एक नज़्म बन
अमृता
तुम मुझे वापस खोज ही लाती हो।
अमृता
कोई माने न माने
आज भी तुम एक पल को
इमरोज़ हो ही जाती हो।
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इमरोज़
इमरोज़
सुनो कोई है
जो अपने जीवन में,
तुम्हारे कुछ कैनवास ,
कुछ रंग,
कुछ बहके हुए स्ट्रोक
चाहती है।
कही एक देह,
अमृता होना चाहती है।
इमरोज़
फिर कहीं एक नज़्म है
जो देह बनकर,
फिर एक बार तुम्हारे कैनवास पर,
रंग होना चाहती है।
कही एक देह,
अमृता होना चाहती है।
इमरोज़
बहुत हुए किस्से संग जीने, संग मरने के,
खाली जूठे गिलासों में,
सिगरेट के बुझे हुए बटों में,
बगैर देह कोई अमृता
आज फिर प्रेम होना चाहती है।
कही एक देह,
अमृता होना चाहती है।
इमरोज
प्रेम से परे,
रंगों से भरे कैनवास पर,
अपने हर रिस्ते को अंत तक फूंक
एक खाली जगह
एक खाली एहसास
एक धुआं होना चाहती है।
कही एक देह,
अमृता होना चाहती है।
इमरोज़
अपनी टूटती हुई साँसों से
अपनी सूखी हुई आंखों के कैनवास पर
तुम आज भी
ये जो अमृता की तस्वीर बना रहे हो,
इस रंग का बस एक छींटा मांग,
किसी नज़्म की शरीके हयात होना चाहती है।
कही एक देह,
अमृता होना चाहती है।
इमरोज़
आज भी कहीं एक अमृता
सब कुछ भूल कर
सिर्फ और सिर्फ
इमरोज़ होना चाहती है।





