१. मेहनतकश लोग
मेहनतकश लोग हमेशा
सड़क के किनारे ही चले हैं
किसी रंगीन पक्षी से प्यार करते हुए
सड़क के किनारे की घास को
अपने खुरदुरे पैरों से गुदगुदाते हुए
उस सुनसान शहर में
जहाँ सच्चाई एक विलुप्तप्राय वस्तु है
उनके नज़दीक आती
भीड़ के पाँव पीछे को हैं
चाकू की कला दिखाते हुए
भीड़ से किसी एक ने
घोंप दिया है चाकू
घर लौटते
किसी साइकिल सवार की आँख में
जो व्याकुल था सच देखने के लिए
अच्छा हुआ कि साइकिल सवार
सच नहीं सुनना चाहता था
नहीं तो कान भी काट लिए जाते
मेहनतकश लोग बहुत धीरे से गुजरते हैं
उस जगह से,
जहाँ बैरियर पर मोटे शब्दों में लिखा है
“यहाँ हॉर्न बजाना मना है।”
थूक अंदर घोंट कर
पसीने को कुछ देर रोक लेते हैं
मेहनतकश लोग,
जहाँ दीवार पर लाल ईंट से लिखा है
“यहाँ पेशाब करना मना है।”
अलकतरे पर दौड़ती पुलिस की जिप्सी देख
वे इस तरह डर जाते हैं
जैसे किसी बच्चे ने जीवन में
पहली बार देख लिया हो
धू-धू कर जलता मोहल्ले का कोई घर
जब एक नई सभ्यता अपने चरम पर होगी
जब खुदाई में सड़क के किनारे
निकलेंगे ऐसे मेहनतकशों के जीवाश्म
तब उसे किसी संग्रहालय में नहीं
बल्कि एक बेनाम
मंदिर में स्थान दिया जाएगा
क्योंकि तब के लोग जानते होंगे
कि एक सभ्यता की नींव रखी गयी थी
इन्हीं मेहनतकशों के हाथ-पाँव पर।
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२. सिस्टम के खिलाफ़ नन्ही चिड़िया
अख़बार पलटती है नन्ही चिड़िया
खोजती है गुम हुए लोगों के
विज्ञापनों में,
रोज़ दिन में एकबार
पुलिस चौकी के चक्कर काट
आती है,
झिड़क देता है दरोग़ा उस को,
शब्द घुट जाते हैं उस के मुँह में ही।
उसे विश्वास हो गया है कि
उसकी माँ की हत्या कर दी गई है
अपनी भूख के लिए
या शायद
उसका अस्तित्व खतरा रहा हो
किसी और के अस्तित्व के लिए,
वो राशन पानी लेकर
खोजती है
एक सस्ता टिकाउ वकील
कानून की भूलभुलैया में राह ढूँढती।
एक दिन ईश्वर की स्तुति के दौरान
एक सरकारी गिद्ध
झपट्टा मार
उठा ले गया उस नन्ही चिड़िया को
किसी आदमखोर खँडहर में,
जहाँ
कई हाथों ने नोंच डाला
उसका कोमल शरीर,
लगातार पाँच दिन
पीड़ा और नर्क के पाँच दिन
उसके बाद
उसे छोड़ दिया गया है
एक जगमग जगह में।
नन्ही चिड़िया
अब भी रत है
ईश्वर की स्तुति में।
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३. कुछ देने की चाह में
देने को बहुत कुछ है
छोटे से इस गाँव की
बड़ी दुनिया में
कोई कहीं प्रेम में
गुलाब देता है
तो कोई हिसाब दे रहा है
दिन भर में हुई कमाई का
पर गाँव रीता हो गया है देते देते
न पहाड़ बचा है
और न जंगल, न नदी
हरियाली भी नहीं
उसके हर चीज़ दे देने बाद भी
कहाँ संतुष्ट हुई हैं
हमारी अदम्य लालसाएँ
प्रेम में तुम न करना
प्राण देने की बात
हाँ!
बस मुझे चाहिए तुम्हारा मत
हृदय के चुनाव में
लेकिन चुनाव केंद्र भी
बिक चुका है कब का
लेन देन के इस व्यापार में
पैसों की चमक के बदले
उस मोटे आदमी को
देखो गौर से और
उसकी गोद में बैठी हुई सरकार को भी
जनतंत्र का तर्पण करती।
मैं तुम्हारे चले जाने के बाद
गाँव की सड़क के उस छोर से
आवाज़ दे सकता हूँ
और दे सकता हूँ
थोड़ी सी धूप
जो बची हुई है मेरी आँखों में
कहो न क्या स्वीकारोगी
मेरी यह भेंट?
मेरे गाँव की मखमली धूप ?
शायद कुछ उजला कर दे
तुम्हारे धुँधले शहर को।
बस इतना करना
झूठी प्रशंसा की बजाय
मुझे गालियाँ दे लेना
मैं सिर झुका कर
स्वीकार लूँगा
अगर ये भी न हो सके
तो रो लेना मेरे लिए
हृदय से
आँखों पर कम है मेरा विश्वास।





