आरी से कटता सूरज
मैं आरी से सूरज काट दूँगा
ताकि दे सकूँ गटर में उतरने वाले आदमी को
उसके हिस्से की रोशनी,
मैं चाँद को जोत दूँगा
ताकि वह किसान भी अपनी फसल उगा सके
जिसे पृथ्वी ने ज़मीन नहीं दी,
मैं आसमान की दाल पकाकर
लगाऊंगा तारों का छौंक
ताकि उसे परोस सकूँ अपनी माँ की थाली में
जिसने मुझे पहली रोटी खिलाई थी!
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काली-धूसर कविता
एक वक़्त आएगा
जब संसार की हर वस्तु
पर लिखी जा चुकी होगी
एक कविता
कोई ज़ालिम के पक्ष में
लिख चुका होगा
महाग्रन्थ
तो किसी की कलम ने
विरह और वियोग
पर लिख-लिखकर
फेंक दिया होगा
खून
वहीं एक भटकता हुआ
विषयहीन कवि
उस ग्यारह बरस के मजदूर की
अधजली बीड़ी की राख को
अपनी कविता बनाएगा
जिसे सभ्यता की भट्ठी का
कोयला लील गया है
और
जिसकी कालिख़ ने
एक खूबसूरत ग़ुलाब को
बना दिया है
भद्दा टाइटन एरम
तभी
एक तेज़ हवा का झोंका
बीड़ी की राख के
साथ-साथ
कवि की कविता भी उड़ा ले जाएगा
क्योंकि
एक काली-धूसर कविता
विद्रोह का भभूत
तो बन सकती है,
सृजन की खाद नहीं!





