कविता-कानन
साँवली हूँ मैं
उगते सूरज की रौशनी में जाग उठता है
चढ़ती धूप के साथ और निखरता है
ढलती शाम के साथ सुनहरा लगता है
सावन में वो बादलों-सा लगता है
लगभग हर रंग के साथ जँचता है
बिना किसी गहने के भी प्यारा-सा लगता है
सादगी तो श्रृंगार का गहना है
कृष्ण का जो था रंग
मेरा भी वही है
हाँ, साँवली हूँ मैं।
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तुम और मैं
तुम और मैं
दो ओस की बूँद जैसे
ज़िन्दगी के सफ़र में मिले
जिस राह ज़िन्दगी ले गयी
चल दिए
और फिर
न जाने कब
एक-दूजे में मिल कर
पानी बन गए
सागर में समा गए
हाँ, तुम और मैं
एक हो गए।
– कनकने राखी सुरेन्द्र




