गीत-गंगा
यह समय हमको क्षमा कैसे करेगा
दीपकों को हम हवाओं के सहारे
छोड़ आयेंगे अगर,
तो बताओ यह समय हमको क्षमा कैसे करेगा!
सिसकियों की ध्वनि हमें
आख़िर डराती क्यों नहीं है!
देखकर दुःख आँख बरबस
भीग जाती क्यों नहीं है!
वेदना को प्रार्थनाओं के सहारे
छोड़ आयेंगे अगर,
तो बताओ यह समय हमको क्षमा कैसे करेगा!
भूख इस थोपे गए दुर्भाग्य
से कब तक लड़ेगी
लड़खड़ाती यह व्यवस्था
क्या हमारा साथ देगी?
पीढ़ियाँ संभावनाओं के सहारे
छोड़ आयेंगे अगर,
तो बताओ यह समय हमको क्षमा कैसे करेगा!
चाहते हैं हम कि हमको
मत मिलें दुःख की कथाएं
बंद हों अब लोचनों से
स्वप्न छिनने की प्रथाएं
सभ्यता को कुप्रथाओं के सहारे
छोड़ आयेंगे अगर,
तो बताओ यह समय हमको क्षमा कैसे करेगा!
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काम कठिन है
अंजुलि भर भर नदी हमें मरुथल तक लेकर जानी है
काम कठिन है,
इसमें सारा जीवन भी लग सकता है।
परित्याग का दंश झेलते
हम हैं कुंवर अयोध्या के
महलों की कानाफूसी ने
दिन दिखलाये विपदा के
अंधे-बहरे दरबारों को अपनी पीर सुनानी है
काम कठिन है,
इसमें सारा बचपन भी लग सकता है।
मान रहे हम अभी
साधना पूरी नहीं, अधूरी है
लेकिन चक्रव्यूह के भीतर
जाना बहुत ज़रूरी है
जी कर या मरकर दुनिया में रचनी नयी कहानी है
काम कठिन है,
इसमें सारा यौवन भी लग सकता है।
मुट्ठी भर किरणें हम
अँधियारों की ओर उछालेंगे
जैसे जहाँ अंधेरा है हम
वैसे दीपक बालेंगे
हमने जुगनू होकर अँधियारों से अपनी ठानी है
काम कठिन है,
इसमें सारा तन मन भी लग सकता है।
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त्योहारों की भोर
दो दिन होली रही गाँव में
चली शहर की ओर,
दादी बाबा को खलती है
त्योहारों की भोर।
छोड़ गया छोटू आँगन में बिखरा हुआ गुलाल
चार चार फुट रँगी हुई है घर की हर दीवाल
रोक न पाया पिचकारी का
बंधन था कमजोर,
दादी बाबा को खलती है
त्योहारों की भोर।
रस्सी पर है गुड़िया की वह होली खेली फ्रॉक
दादी को रँग दिया परी ने खूब मज़ाक मज़ाक
रखी हुयी गुड़िया की बेली
हर पूड़ी चौकोर,
दादी बाबा को खलती है
त्योहारों की भोर।
गुझिया रखी हुई हैं लेकिन जाती रही मिठास
बेटा बहू गये घर से तो घर हो गया उदास
नज़र चुराते बुड्ढा बुढ़िया
भरे आँख में लोर,
दादी बाबा को खलती है
त्योहारों की भोर।
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ओ अभागे आँसुओं!
ओ अभागे आँसुओं!
तुम आँख से बाहर न आना,
यह समय नकली हँसी मुस्कान का है।
दूर तक, दिखता नहीं कुछ भी कहीं भी रोशनी-सा
शूलियाँ तैयार, खोजे जा रहे हर ओर ईसा
प्यास की खातिर कठिन
दो बूंद पानी खोज पाना,
यह समय सुकरात के विषपान का है।
हों रहीं सक्रिय महल में कुछ कुचक्री मन्थराएं
राम को अब चाहिए वह जंगलों की ओर जाएं
और दशरथ को पड़ेगा
क्या भला फिर से बताना,
यह समय भूले हुए वरदान का है।
अर्गलाएं हैं चढ़ी बस पारदर्शी खिड़कियाँ हैं
वे नहीं सुन पा रहे हैं इस तरफ जो सिसकियाँ हैं
घर चलो अब क्या किसी को
पीर का किस्सा सुनाना,
यह समय अपना नहीं श्रीमान का है।
– ज्ञान प्रकाश आकुल




