कविता-कानन
भूख
भूख दोनों में थी
किसान में कम,
ज़मींदार में थोड़ी ज़्यादा।
फ़र्क बस इतना था
भूख लगने पर
ज़मींदार दहाड़ता था
और
किसान को कराहने की भी
फ़ुरसत नहीं थी।
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तुम
तुम बहती
एक नदी के धारा-सी
मैं मिला तुमसे
तेल की एक बूँद बनकर
मैं आज भी दिन प्रतिदिन
शीतल होता
बहता हूँ।
तुम्हारी धारा में
और एक तुम
जो अब तक
इससे बिल्कुल अंजान हो।
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ख़ामोशी
ख़ामोशी
केवल ख़ामोशी
तुम्हारे और हमारे बीच
छत और फर्श के बीच
वही ख़ामोशी
जो धरती और आकाश के बीच
सदियों से है।
ख़ामोशी खींचती है
और ले जाती है
एक दूसरे से दूर।
कभी देखा है
आकाश और धरती के बीच
कोई बात होते हुए
या फिर
आपस में झगड़ते हुए
कहाँ होता है ये सब
उनके बीच।
यही छत और फर्श के बीच भी है।
बादल फटकर गिरता है या
छत से गिरती है
टूटकर छोटी-सी पपड़ी
और टूटती है ख़ामोशी
केवल पल भर।
मगर हमारे बीच की ख़ामोशी
कमरे की दो दीवारों के
बीच की ख़ामोशी है।
आकाश ढ़हे तो
धरती पर गिरेगा
और छत भी फर्श पर
मगर हम ढहेंगे भी तो
अपनी-अपनी जगह,
कमरे की दो दीवारों की तरह।
नहीं, तोड़ना होगा
मुझको या तुमको
इस ख़ामोशी को
नहीं तो ये ख़ामोशी ले जायेगी
मुझको और तुमको
और फेंकेगी इतनी दूर
कि परास का अंदाजा
शायद ही लगे।
इसी बीच
मैं प्रयास करता हूँ
ख़ामोशी को तोड़ने का
मगर कंठ के भीतर ही
लड़खड़ाकर रह जाती है
बेबस जीभ
कंठ से उतरता है
कुछ शीतल तरल
निकलती है एक ध्वनि
बिल्कुल ‘न’ भर
और वो भी
ख़ामोशी के इस दायरे में
ख़ामोश होकर रह जाती है।
और ख़ामोशी
ख़ामोशी से
हमारे भीतर करती रहती है
कोलाहल।
– प्रतीक त्रिपाठी





