कविताएँ
परिवर्तन का शोर और परिवर्तन
वर्तमान की देहरी पर
ख़ामोशी जब भयावह हो उठती है
तब खोल देती हूँ अतीत के कब्रिस्तान का दरवाजा
दहला देनेवाली चुप-सी चीखें
रेंगता साया
विस्फारित चेहरों की लकीरें
अतीत और वर्तमान में
बदलाव तो है
पर उसी तरह –
जिस तरह लड़कियों के जीवन में दिखाई देता है !!!
वक्तव्य ठोस – लड़का लड़की समान
लड़की लड़के से बेहतर!
लड़की कमाने लगी
पर थकान आज भी एक-दो घरों को छोड़
सिर्फ लड़कों की!
दहेज़ की माँग पूर्ववत!
गोरी,काली का भेद नहीं जाता उसकी नौकरी से
और लड़का –
घी का लड्डू टेढ़ो भलो !!!
परिवर्तन का शोर
परिवर्तन –
भाषण और सच के मध्य बारीक लकीर जैसी …
लड़कियों का उच्चश्रृंखल अंदाज परिवर्तन नहीं
कम कपड़े परिवर्तन नहीं
परिवर्तन है –
नौकरी के लिए घर से बाहर अपनी तलाश
तलाश के आगे कई सपनों की हत्या!
परिवर्तन है –
लड़की का लड़का बन जाना
और उस वेशभूषा में सीख –
कुछ लड़की-सा व्यवहार करो!
लड़की लड़का-सी हो
या संकुचित सिमटी
या व्यावहारिक …
आलोचना होती रहती है!
हादसे के बाद उसकी इज़्ज़त नहीँ होती
नहीं होता कोई न्याय
तमाम गलतियों की जिम्मेदार वही होती है
माशाअल्लाह
लड़के में कोई खामी नहीं होती!
वह खून करे
इज़्ज़त छीन ले
शराब पीकर,क्रोध में हाथ उठाये
फिर भी वह दोषी नहीं होता
परस्त्री को देखे
तो पत्नी में कमी
वह बाँधकर रखने में अक्षम है
पुरुष तो भटकेगा ही !!!
है न परिवर्तन में वही सड़ांध ?
…. हाँ लड़कियाँ पढ़-लिख गई हैं
देश-विदेशों में नौकरी करने लगी हैं
…घर से बाहर वह दौड़ रही है अपना अस्तित्व लिए
घर में कमरे के भीतर वह जूझ रही है
अपने अस्तित्व के लिए
यूँ …. अपवाद कल भी था, आज भी हैं
उदहारण कल भी था, आज भी है
परिवर्तन एक शोर है
संसद भवन जैसा
जहाँ कोई किसी की नहीं सुनता
शहरी सियार की हुआ-हुआ है
जो आज भी जंगली है !!
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फिर जियो
परेशानियाँ सबके दरवाज़े बैठी रहती हैं
सबकी ख़ातिर वह जटिल,उबाऊ
और तकलीफ़देह होती हैं
पर – सीमित सोच
ख़ुद से ऊपर नहीं जाती ….
अपना दुःख सबसे बड़ा लगता है
जबकि दुखों के भयावह जंगलों की
नरभक्षी,वहशी जानवरों की
काँटेदार बाड़ों की कोई कमी नहीं
बस इतना फर्क है
कि कोई जीने की कोशिश करता है
कोई मौत मांगता है
कोई खुद को खुद से मार देता है
…..
अक्सर – जो दर्द को आत्मसात कर
ज़िन्दगी के विभिन्न रंगों को भी जीता है
लोग उसकी तकलीफ से बेखबर,
उदासीन
उसकी आलोचना करते हैं!
आदमी …!!!
ईश्वर की अद्भुत कलाकृति
जिसे गढ़ते हुए
खुद ईश्वर भी नहीं जान पाया
कि उसकी अगली चाल क्या होगी!
आदमी के ज़हर को उतारना
कोई नहीं जानता
नीलकंठ का नीला कंठ तो दिखता भी है
पर आदमी का ज़हर
नसों में प्रवाहित होता है
जिसकी जाँच रिपोर्ट भी नहीं मिलती
सिर्फ अटकलों से किसी को जानना
अनुमान से सिद्ध करना
नीम हक़ीम खतरे जान है!
दुख,परेशानी से घिरा इंसान
मानसिक रूप से बीमार होकर भी
अन्दर से सशक्त होता है
और दूसरे के दर्द को अपने दर्द के आगे मान देता है
…..
समंदर की शोर मचाती हर लहरों में सौन्दर्य होता है
हर बार – पहले से कुछ ज्यादा….
दर्द की स्थिति भी समंदर-सी होती है
चेहरे पर शांत मीठी-सी हवा
और गहरे …….
?
गहरे उतरना आसान नहीं
जो उतर गया
वह असली मोती
और जीवन का अर्थ पा गया…. !!!
दर्द की व्याख्या नहीं हो सकती …
गर बैठ जाओ समंदर के किनारे अकेले
तो जाने कितने रहस्य मिलते हैं
ठीक उसी तरह
कभी दर्द में मुस्कुराते लोगों से मिलो
देखो,सुनो …..
अपने दर्द फीके लगने लगेंगे
और दर्द से उबरने के रास्ते दिखने लगेंगे
………
सोचो –
लोगों के बीच किसी ने थप्पड़ मारा
तुम सुलगने लगते हो ….
एक दिन कुछ समय के लिए
खुद में अरुणा शानबाग को जियो
दामिनी को जियो
उस घर को जियो –
जिसका बेटा
चेहरे के बगैर अपने घर पहुंचा
सूनामी में
एक पल में ढह गए घर में
अबोध चेहरों के आगे प्रश्न देखो
फिर जियो ….
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सृष्टि की दृष्टिजन्य निरंतरता
जीवन के वास्तविक कैनवास पर
अपूर्णता की आंखमिचौली
एक ईश्वरीय सत्य है
अपूर्णता में ही पूर्णता की चाह है
तलाश है –
अपूर्णता के गर्भ से
परिस्थितिजन्य पूर्णता का जन्म
सृष्टि की दृष्टिजन्य निरंतरता है!
पूर्णता का विराम लग जाए
फिर तो सबकुछ खत्म है
न खोज,न आविष्कार
न आकार,न एकाकार …
संशय का प्रस्फुटन
मन को,व्यक्तित्व को
यायावर बनाता है
कोलंबस यायावर न होता
तो अमेरिका न मिलता
वास्कोडिगामा को भारत ढूँढने का
गौरव नहीं मिलता!
मृत्यु से आत्मा की तलाश
आत्मा की मुक्ति
और भ्रमित मिलन का गूढ़ रहस्य जुड़ा है
खुदा यूँ ही नहीं आसपास खड़ा है !
कल था स्वप्न
या आज स्वप्न
क्या होगा उलझकर प्रश्नों में
कल गया गुजर
गुजर रहा आज है
आनेवाला कल भी अपने संदेह में है
मिट गया या जी गया
या हो गया है मुक्त
कौन कब यह कह सका है!
एक शोर है
एक मौन है
माया की कठपुतलियों का
कुछ हास्य है
रुदन भी है
छद्म है वर्तमान का
जो लिख रहा अतीत है
भविष्य की तैयारियों पर
है लगा प्रश्नचिन्ह है!
मत करो तुम मुक्त खुद को
ना ही उलझो जाल में
दूर तक बंधन नहीं
ना ही कोई जाल है…
खेल है बस होने का
जो होकर भी कहीं नहीं
रंगमंच भी तुमने बनाया
रंगमंच पर कोई नहीं!
पूर्ण तुम अपूर्ण तुम
पहचान की मरीचिका हो तुम
सत्य हो असत्य भी
धूल का इक कण हो तुम
हो धुंआ बिखरे हो तुम
मैं कहो या हम कहो
लक्ष्य है यह खेल का
खेल है ये ज्ञान का
पा सको तो पा ही लो
सूक्ष्मता को जी भी लो
पार तुम
अवतार तुम
गीता का हर सार तुम !!!………
– रश्मि प्रभा




