कविता-कानन
तुम्हारा फिर से नामकरण होगा
तुम्हारे मन के हर संगीत को
बाँध दिया जाएगा
तुम्हारी पायल के घुँघरू के साथ
बेपरवाह गीतों को लयबध कर दिया जाएगा
तुुम्हारे आँखों के सपनों को
सजा दिया जाएगा
प्रतिदिन बदलते तुम्हारे रंगीन आईलाईनर के साथ
तुम्हारे दिन और रात
काले और सफेद आईलाईनर से रेखांकित कर दिये जाएँगे
बदलती ऋतुओं के साथ
जब तुम्हारे मन में
खिल रहे होते हैं
अमलताश, पलाश और मोगरे के फूल
तब तुम्हारे वैनिटीबॉक्स में
नये नये रंग के लिपकलर रख दिए जाएँगे
तुम्हारे हाथों की घुँघरुओं वाली
काँच की चूड़ियों को
सलीके से सोने के कंगनों में बदल दिया जाएगा
तुम्हारी तरह तरह की गूंथी चोटियों में
लगने वाले रंग-बिरंगे रिबन
बटरफलाई वाली कलिप
तुम्हारे परियों जैसे हैडगियर
मोगरे के गज़रों में बदल दिये जायेंगे
गले में पहने जाने वाले
हर ड्रैस से मैच करते
तुम्हारे रंग-बिरंगे चौकर
बदल दिये जाएँगे
कर्तव्यों से बँधी सोने की जंजीरों से
क्या तुम्हें लुभा पाएँगे
तुम्हारे हीरे जड़ित भी नौलखा हार
जब तुम सोने जाओगी
अपनी दुखती गर्दन से
कुछ देर के लिये
ये कर्तव्य के बोझ उतार भी पाओगी?
तुम्हारी राखियों वाले नेह के धागों को
अंतर्देशीय लिफाफों में डाल
पकड़ा दिये जाएँगे
नित नई प्रार्थनाओं के धागे
और बाँधा करोगी इन्हें
पीपल, बरगद के इर्द-गिर्द
अंजलि भर जल ले
सूरज को पिलाओगी
चाँद में सपने तलाशना छोड़
आधे चाँद पर वारी वारी जाओगी
जब धरती की गोलाई
नापना छोड़
रोटी की गोलाई नापा करोगी
पापा की गलती ना होने पर भी
माफ़ी मंगवा मानने वाली
अब चुल्हे पर चढ़ा दूध
खो जाओगी बाकी बचे दिन का हिसाब लगाने में
और उफ़न जाने पर दूध
हफ़्ता भर खुद से माफी माँगोगी
किसी अशुभ की आशंका से
तुम्हारी पोशाकों के रंग
जब त्यौहारों, उत्सवों के दिन तय किया करेंगे
तुम्हारे गोल-मटोल हाथों से
स्टापू की गोटियाँ गीटे गुड़िया ले
मेहंदी का गोल सूरज रख दिया जायेगा
तब तुम्हारा फिर से नामकरण होगा
तब तुम रानी बिटिया, गुड़िया
जैसे अपने नामों को भूल
किसी भी अलंकार से बुला लेने पर
सब कुछ अधूरा छोड़
दौड़ी चली जाओगी
तुम अब इन्हीं नामों से जानी जाओगी
ये तुम्हारा फिर से नामकरण होगा
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तुम एक अच्छी लड़की हो
तुम हवाओं के साथ-साथ
नहीं उड़ती
ना समुद्र की लहरों संग
मचलती हो
तुम किसी हिदायत, समझौते का
प्रतिकार नहीं करती
ना ही किसी पैने होते प्रश्नों से
होड़ लेती हो
तुम गर्मी की दुपहरी में अपनी गली का
चक्कर नहीं लगाती
ना ही तुम नुक्कड़ वाली दादी के घर से
कच्ची अम्बी तोड़ कर खाती हो
तुम अपनी अँखियों में
चाँद-सितारे नहीं सजाती
ना तुम वो नीले वाले पहाड़ के उस पार
जाकर आना चाहती हो
तुम किसी शाम को आईने में
मुँह बना-बिगाड़ कर नहीं देखती
ना ही तुम उँगली जल जाने पर या कट जाने पर
किसी को रोती हुई दिखती हो
तुम आधे पूरे दिन के उपवास रख रख कर भी
भूखी नहीं होती हो
ना ही तुम अपनी मौन की
गठरी खोलती हो
तुम एक अच्छी लड़की हो
अब तुम एक लड़की हो
अब तुम एक नयी खिड़की से
रेंग कर नहीं, कूद कर बाहर आ जाती हो
तम की कोख से उजालों को उगाती हो
घबराई हुई तितलियों को लाकर
फूलों पर बैठाती हो
ओस से कंठ भिगा नये गीत गा लेती हो
अँजुरी में नदियाँ उलीच लेती हो
अब नयी कविताएँ लिख लेती हो
अब तुम एक लड़की हो
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अब तुम प्रेम में हो
जब तुमने छुआ था
गोल घूमती पृथ्वी को
देखा था तुमने……?
ठीक उसी एक क्षण
पृथ्वी पर घटित समय
बहुत हज़ार वर्ष आगे सरक गया था
जब तुमने नदी का
आखिरी बचा घूंट
अपनी अंज़ुरी में भरा था
एक कोलाहल सुना होगा तुमने
वो समुद्र की तड़प थी
जो उस एक क्षण में
खुद आगे सरक आया था
उस नदी को आलिंगन करने को
और तुम देख रहे थे निर्निमेष
अब भरी नदी को
याद है जब तुमने
उन बंद हो रही सांस को छूआ था
ठीक उसी क्षण
बादल हड़बड़ाये थे
लाल-पीले रंग मुख पर चढ़ आये थे
जैसे पृथ्वी का आँचल
खींच लिया हो मुख पर
ये वही क्षण था जब पृथ्वी कराही थी
प्रसव पीड़ा से
देखा था तुमने……..?
एक कोंपल जन्म ले रही थी
तुम्हारे छूने भर से ही
चाँदनी बिखर रही थी हर ज़र्रे में
अब तुम प्रेम में हो
अब बादलों को नहीं ठेलना पड़ता चाँद
अब तुम मुक्त हो खुद से
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आज फिर
आज फिर
कलम की नोंक के नीचे
कुछ महसूस हुआ
कुछ था
जो कलम को बढ़ने ही नहीं दे रहा था
हाथ थम गये
विचार रूक गये
देखा
थोड़ा कुरेदा
एक पुराना रिसता हुआ
ज़ख़्म था
कलम की नोंक से
या उसकी स्याही से छिल गया था
दर्द……?
शायद संवेदनहीनता थी
या कहीं ठहर गया था
जब ज़ख़्म थोड़ा कुरेदा
फिर समझ आया
ये ज़ख़्म
आज़ादी की कुर्बानियाँ भूल जाने का है
मन में पड़ी बेड़ियों का है
हमारी कर्तव्यहीनता का है
आओ कुरेद दें और थोड़ा थोड़ा
कुछ तो दर्द हो!!
– अंजू जिंदल




