कविताएँ
मुआवजा
चलो!
अंगोछे बाँध लें खलिहान
पीठ टांग लें गृहस्थी
अब
उगाने
हथेली पर सरसों/मखमली ख़्वाब
खेतों से
गुजरेगा विकास पथ
धरा उगलेगी सोना
बनेंगे तमगे
जिन पर
अंकित होंगे
किसानी चेहरे
गेंहू की बालियों के बीच
जो दिए जाएंगे
मुआवजे स्वरूप
आत्म-हत्याई शहीदों के
बचे रहने वालों को
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बिसात
बिसात का
हर बादशाह
हिफाज़त हेतु
रखता है
सुरक्षा कवच
जिसमें होता है
एक वजीर
कुछ जानवरों के साथ
खुद को बचाए रखने
बादशाह, वजीर, ऊंट, हाथी, घोड़े
सब चलते रहते हैं
टेढ़ी-मेढ़ी ढाई चाल
अपने मतलब से
हो सकते हैं
आगे भी, पीछे भी
किंतु
बेचारे प्यादे!
निरीह, पैदल!
जो नहीं मार सकते
किसी को भी सीधे-सीधे
ना ही मुड़ सकते पीछे
उन्हें तो
सिर्फ
मरना ही होता है
सबसे पहले
आमने-सामने
हाँ,
अगर
भाग्य से
कोई प्यादा
बचकर
पहुँच भी जाता है
परले पार
तो भी
निज भूल
उसे ही देता है जीवन
जिसकी लीक पर/रीत पर
लड़ता रहा अनवरत
किंतु
पुनर्जीवित
फिर से
चलेगा
टेढ़ी-मेढ़ी चालें
हार/जीत के नाम
विनाश तक
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पसंद
पता नहीं क्यों
‘फूल’ ही है
पसंद ज़माने की
हो जिसकी औकात
सिर्फ
एक ही बार
खिल कर
मुरझाने की
वरना
पत्थर तो है
सतत-सक्षम
बनने को बुनियाद
होती है
जिसकी फितरत
दर्द से भी
ले आकार
सदा मुस्कराने की
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जलजला
मनुज मन
टाँगने अहम् आकाश
होने तुष्ट
बढ़त होड़ में
नोंच कर गर्भ
छाती पर गाड़ता गया
कंकरीटे सितारे
असंख्य, विशाल
करता गया
धरा दोहन
अथक-अथाह
आखिर
बोझिल आँचल
असहज ममता
कभी तो
जलजलाएगी
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खिलखिलाओ
सब
अशुभ/अशोभनीय
छुपा लो अंतर में
पेट टांग लो पिछवाड़े
कि ना दिख पाएँ
सूखी आंतें
जीर्ण लहू से
रंग दो
नवोढाओं के ओष्ठ
कि पीत मुख
लगे स्वर्णाभ
कि आज
तुम्हें सजाने
हम लाए हैं
चूड़ियां/सिंदूर/झालर
कि खनाखनाओ
खिलखिलाओ
कि छलावे के ईंधन से
रोशन होते रहें
हमारे अखबार
हमारा राजपथ
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जीव
जीव है
योनि/जमात
सब बेमानी
सिर्फ
एक सत्य-स्वार्थ!
स्वार्थ
(अच्छा हो पाने का/बुरा न हो पाने का)
बनाता सक्रिय
अन्यथा
मृत/निष्क्रिय
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बदलाव
फिजां में
घुल चुका फरेब
बदल गए मानदंड
अब
गुनाह है
सत्य बोलना
ईमानदारी से काम करना
अब
परवाज़
परों की नहीं
परचमों की दम है
– राम निवास बांयला





