धर्म के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि लोग पहले जैसे धार्मिक नहीं रहे, बल्कि यह है कि धार्मिकता धीरे-धीरे मात्र अनुष्ठानों तक सिमटती जा रही है। पर्व आते हैं, व्रत होते हैं, पूजा-पाठ होता है, क्षमा-याचना के संदेश भेजे जाते हैं और फिर जीवन अपनी पुरानी गति में लौट आता है। ऐसे में दशलक्षण धर्म का प्रथम गुण ‘उत्तम क्षमा’ हमें चिंतन का अवसर देता है कि अंततः हमारे भीतर, धर्म कितना शेष है?
जैन दर्शन में क्षमावाणी किसी दूसरे की गलती माफ करने से कहीं अधिक गहरी बात है। यह अपने भीतर उठने वाले क्रोध, अहंकार, द्वेष और प्रतिशोध पर विजय पाने की साधना है। इसके केंद्र में कोई दूसरा व्यक्ति नहीं, स्वयं मनुष्य ही है। प्रश्न यह नहीं कि दूसरे ने क्या किया, बल्कि यह कि उसके व्यवहार के बाद हम अपने भीतर क्या उत्पन्न कर रहे हैं? किसी के द्वारा किया गया अपमान उसके संस्कार का प्रश्न है परंतु उस अपमान को वर्षों तक मन में बसाये हुए क्रोधाग्नि में जलते रहना हमारा अपना निर्णय है।
मनुष्य की स्मृति बड़ी विचित्र है। घटना कुछ क्षणों की होती है, पर उसका बहीखाता वर्षों चलता है। सामने वाला अपने जीवन में आगे बढ़ जाता है, इधर हम उसी घटना को दिल से लगाए रहते हैं। यही क्रोध की सबसे बड़ी विडंबना है कि हम सोचते हैं, दूसरे को दंडित कर रहे हैं जबकि वास्तविकता में अपने ही हृदय को दंडित कर रहे होते हैं।
कई बार ‘मैंने माफ कर दिया’ कहने के पीछे भी सूक्ष्म अहंकार छिपा होता है। हमें लगता है कि मैं तो क्षमा करने वाला महान व्यक्ति हूँ, इसलिए ऊपर हूँ और क्षमा पाने वाला नीचे हैं। ‘उत्तम क्षमा’ इस श्रेष्ठता-बोध को भी चुनौती देती है। यह किसी पर किया गया उपकार नहीं, अपने भीतर एकत्रित विष को छोड़ने का अभ्यास है।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि गलत व्यवहार का विरोध करना, अपनी सीमाएँ तय करना और आवश्यकता पड़ने पर न्याय मांगना पूरी तरह उचित है। क्षमा का अर्थ किसी अन्याय को स्वीकार करना कतई नहीं होता। किंतु न्याय और प्रतिशोध एक नहीं हैं। न्याय, व्यवस्था और संतुलन स्थापित करता है जबकि प्रतिशोध प्रायः दूसरे को कष्ट देकर अपनी पीड़ा का हिसाब बराबर करने की कोशिश होता है। ‘उत्तम’ क्षमा व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाती बल्कि यह तो गलत का विरोध करते हुए भी भीतर द्वेष का स्थायी घर बनने से रोकती है।
सार्वजनिक जीवन में इस भाव की उपस्थिति पहले से कहीं अधिक होनी चाहिए क्योंकि असहमति को शत्रुता मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर कुछ ही क्षणों में वैचारिक असहमति, व्यक्तिगत आक्षेप बन जाती है। राजनीतिक विरोध निजी दुश्मनी में बदल जाता है, परिवारों में पुरानी शिकायतें पीढ़ियों तक ढोई जाती हैं और कार्यस्थलों पर छोटी प्रतिस्पर्धा भी स्थायी कटुता छोड़ जाती है। जहाँ हर असहमति का उत्तर अपमान हो, वहाँ संवाद और सह-अस्तित्व दोनों खतरे में पड़ जाते हैं। इसलिए क्षमा केवल व्यक्ति विशेष का सद्गुण और शिष्टाचार ही नहीं, एक सामाजिक आवश्यकता भी है।
दशलक्षण धर्म में क्षमा को प्रथम स्थान मिलना भी सार्थक है। क्रोध दृष्टि को संकुचित करता है और तत्काल प्रतिक्रिया के लिए विवश करता है, जबकि क्षमा प्रतिक्रिया और विवेक के मध्य थोड़ा स्थान बनाती है। इसी स्थान में आत्मचिंतन संभव होता है। क्रोध शांत हो तभी मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग,आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य (दशलक्षण) जैसे गुणों के लिए भूमि तैयार होती है। क्रोध से भरा मन विनम्र कैसे होगा, द्वेष से भरा मन सरल कैसे होगा? इस अर्थ में ‘उत्तम क्षमा’ केवल पहला गुण नहीं, आगे की पूरी आध्यात्मिक यात्रा का प्रवेशद्वार है।
क्षमा का एक ऐसा पक्ष भी है जो प्रायः भुला दिया जाता है, वह है स्वयं को क्षमा करना। दूसरों की भूलों के प्रति हम जितने कठोर होते हैं, अपनी भूलों के साथ कभी-कभी उससे भी अधिक कठोर हो जाते हैं कि ‘मुझसे ऐसी भूल कैसे हो सकती थी?’ भूल स्वीकारना धर्म है, प्रायश्चित करना धर्म है, उससे सीखना धर्म है, पर उसे उम्र पर्यन्त ढोते रहना आत्मशुद्धि नहीं होती। बीते हुए को सही ठहराना और उसे छोड़ देना, दोनों अलग बातें हैं। ‘उत्तम क्षमा’ भूल को उचित नहीं ठहराती, वह केवल उसका बंदी बने रहने से रोकती है।
यहीं ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ जैसी परंपरा का वास्तविक अर्थ खुलता है। यदि यह मात्र औपचारिक संदेश बनकर रह जाए तो इसका प्रभाव सीमित ही रह जाएगा। यदि इसके पीछे ईमानदार आत्मपरीक्षण हो कि मैंने किसे दु:ख दिया, किससे कठोर शब्द कहे, किसके प्रति द्वेष रखा और क्या मैं सचमुच बदलने को तैयार हूँ? तभी यह परंपरा जीवंत बनती है। क्षमा मांगना सरल है, स्वयं का व्यवहार बदलना कठिन। यदि हर वर्ष हम क्षमा मांगते हैं और अगले वर्ष भी वही क्रोध, वही अहंकार, वही कटुता हमारे भीतर बनी रहती है, तो समीक्षा पर्व की नहीं, अपनी साधना की होनी चाहिए।
जैन दर्शन का ‘अनेकांतवाद’ सिखाता है कि सत्य को देखने की हमारी दृष्टि सीमित हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी परिस्थिति, अनुभव और संस्कारों के भीतर से संसार को देखता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि सत्य का अस्तित्व ही नहीं है बल्कि यह है कि “मेरी दृष्टि ही सम्पूर्ण दृष्टि नहीं है।”
वैसे भी धर्म का मूल्य इससे तय नहीं होता कि हमने कितनी बार मंत्रोच्चारण किया बल्कि इससे सिद्ध होता है कि उन शब्दों ने हमारे भीतर क्या बदला! जब कोई विवाद हो और हम उसे जीतने की जिद छोड़ दें, जब आलोचना सुनकर तुरंत पलटवार करने के बजाय भीतर उठे क्रोध को देख लें, जब पुराने अपमान को बार-बार जीकर स्वयं को जलाने के भाव से मुक्त हो जाएँ, वहीं ‘उत्तम क्षमा’ घटित होती है। जहाँ प्रतिकार करने की क्षमता होते हुए भी प्रतिशोध का त्याग होता है, वहाँ क्षमा की वास्तविक ऊँचाई दिखाई देती है। इसीलिए कहा गया है –
“क्षमा वीरस्य भूषणम्।”
पर्व एक दिन समाप्त हो जाता है और पूजा-अर्चना भी सम्पन्न हो जाती है लेकिन धर्म की परीक्षा उसके बाद प्रारंभ होती है। ‘उत्तम क्षमा’ मात्र एक शब्द-युग्म नहीं बल्कि आत्मनिरीक्षण की वह अवस्था है जहाँ कभी क्रोध को स्थान लेने की अनुमति नहीं मिलती!






