श्रीगंगानगर में 18 जून 2026 को एक 13 वर्ष की बच्ची के साथ हुई सामूहिक दरिंदगी की घटना केवल एक अख़बार की सुर्खी नहीं बल्कि हमारे समाज के अंतःकरण पर गहरा आघात है। हर बार ऐसी घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर गुस्सा उमड़ता है, टीवी स्टूडियो गरम होते हैं और फिर सब कुछ भूलकर लोग नए मुद्दों में उलझ जाते हैं। 16 दिसंबर 2012 की निर्भया घटना के बाद कड़े कानून और फास्ट ट्रैक अदालतें बनने के बावजूद यदि आज भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, तो हमें अपनी व्यवस्था पर सवाल उठाना होगा। इस मामले में प्रशासन ने आरोपियों को पकड़ा और संबंधित होटलों पर बुलडोज़र चलाकर त्वरित कार्रवाई की। लेकिन हमें समझना होगा कि इमारतों को गिराने जैसी प्रशासनिक कार्रवाई और वास्तविक न्यायिक न्याय में बड़ा फर्क है। बुलडोज़र किसी बच्चे के मन में बैठे डर को नहीं मिटा सकता और न ही टूटे बचपन को वापस ला सकता है। असली न्याय तब मिलता है जब अपराधियों को बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण के समय पर कड़ी सज़ा मिले और पीड़ित को यह विश्वास हो कि राज्य उसके साथ खड़ा है।
आँकड़ों का आईना
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। दुखद यह है कि ये आँकड़े पूरी तस्वीर बयां नहीं करते क्योंकि भारतीय समाज में बदनामी और ‘पारिवारिक इज्जत’ के डर से अनेक मामले थाने तक पहुँच ही नहीं पाते। इसके अलावा, यौन हिंसा को लेकर हमारी चर्चा अक्सर अधूरी रहती है। एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत शोषण का शिकार होने वालों में लड़कों की भी एक बड़ी संख्या है। लेकिन “मर्द बनो” और “रो मत” जैसी सामाजिक सीख के कारण लड़के अपनी पीड़ा जाहिर नहीं कर पाते। यही भयावह स्थिति ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भी है, जिनकी पहचान को ही समाज सहजता से स्वीकार नहीं करता, जिससे उनके खिलाफ होने वाले अपराधों का सही रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं है। जब तक कोई मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में न आए, तब तक समाज उस पर बात नहीं करता। क्या दिल्ली, किसी छोटे कस्बे, किसी लड़के या ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पीड़ा का दर्द अलग-अलग हो सकता है?
भारत में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, हर साल औसतन 29,000 से 33,000 बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं, जिसका मतलब है कि देश में प्रतिदिन औसतन 80 से अधिक बलात्कार के मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज होते हैं।
NCRB द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार:
- वर्ष 2024: देश भर में कुल 29,536 मामले दर्ज किए गए।
- वर्ष 2022: कुल 31,516 मामले सामने आए।
- वर्ष 2021: कुल 31,677 मामले दर्ज किए गए (औसतन 86 मामले प्रतिदिन)
- वर्ष 2020: महामारी के दौरान यह संख्या 28,046 थी।
- वर्ष 2019: कुल 32,033 मामले दर्ज हुए थे।
परिचितों का ख़तरा और समाज की संवेदनहीनता
आज की सबसे डरावनी सच्चाई यह है कि अधिकांश मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं बल्कि पड़ोसी, रिश्तेदार, शिक्षक या कोई परिचित होता है। बचपन में हमें अजनबियों से सावधान रहना सिखाया जाता था लेकिन आज बच्चों को अपनों के बीच भी असुरक्षित रहना पड़ रहा है। जब घर, स्कूल और रिश्ते ही सुरक्षित न बचें, तो यह केवल कानून की नहीं बल्कि पूरे सामाजिक चरित्र की विफलता है। इस विफलता को हवा देती है वह संवेदनहीन मानसिकता, जहाँ न्यायपालिका या राजनीतिक मंचों से बलात्कार को लेकर बेहद आपत्तिजनक और मजाकिया टिप्पणियाँ की जाती हैं। जिस समाज में ऐसी संवेदनहीनता पर लोग हँसने लगें, वहाँ अपराधियों को पनपने का माहौल खुद-ब-खुद मिल जाता है। अपराधी लिंग नहीं बल्कि केवल अवसर और लाचारी देखता है। इसलिए, यौन हिंसा केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं है; यह उस समाज का आईना है जो तकनीक और अर्थव्यवस्था में तो आगे बढ़ रहा है, लेकिन अपनी बेटियों और बच्चों को एक सुरक्षित बचपन देने में असमर्थ है। देह पर होने वाला यह हमला, अंततः मनुष्य की आत्मा पर सबसे गहरा प्रहार है।
पुरुष और ट्रांसजेंडर समुदाय की अनदेखी पीड़ा
यौन हिंसा की चर्चा अक्सर महिला केंद्रित होती है, जो स्वाभाविक भी है लेकिन अपराधी लिंग नहीं बल्कि केवल अवसर और लाचारी देखता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और पॉक्सो (POCSO) के आँकड़े बताते हैं कि नाबालिग लड़कों के साथ भी यौन शोषण के मामले बड़ी संख्या में होते हैं। परंतु, “मर्द बनो” और “लड़के कमज़ोर नहीं होते” जैसी सामाजिक सीख के कारण लड़के अपनी पीड़ा साझा नहीं कर पाते; उन्हें डर होता है कि समाज सहानुभूति देने के बजाय उनकी मर्दानगी पर हँसेगा। यही भयावह स्थिति ट्रांसजेंडर समुदाय की भी है, जिन्हें समाज ने मुख्यधारा से वैसे ही बाहर कर रखा है। उनके खिलाफ होने वाली हिंसा को अक्सर मज़ाक समझ लिया जाता है, और पुलिस व व्यवस्था पर भरोसा न होने के कारण उनके मामले थाने तक पहुँच ही नहीं पाते। जब तक हम अपनी संवेदना को केवल लिंग-केंद्रित रखने के बजाय व्यक्ति-केंद्रित नहीं बनाएंगे, तब तक न्याय का विचार अधूरा ही रहेगा। यौन हिंसा का शिकार होने के लिए किसी खास लिंग का होना ज़रूरी नहीं केवल असहाय होना ही काफी है।
मीडिया और राजनीति का तमाशा
किसी जघन्य अपराध के बाद हमारे यहाँ लगभग एक तयशुदा पटकथा चलती है। एफआईआर दर्ज होने और आरोपियों की गिरफ़्तारी को लोग न्याय की शुरुआत मान लेते हैं, जबकि असली संघर्ष इसके बाद शुरू होता है- थाने के चक्कर, बार-बार बयान, अदालत की तारीखें और समाज की चुभती निगाहें। हमारे न्याय तंत्र में चार्जशीट तो समय पर दाखिल हो जाती है, लेकिन अंतिम फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं। इस देरी के बीच गवाह बदल जाते हैं और पीड़ित व्यवस्था से लड़ते-लड़ते थक जाता है। इस मानवीय त्रासदी को मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ‘टीआरपी और कंटेंट’ की तरह इस्तेमाल करता है, जहाँ तथ्यों से ज़्यादा नाटकीय संगीत और चीखती हुई बहसों को प्राथमिकता दी जाती है। वहीं राजनीति भी इस आपदा में अवसर खोजती है; अपराध किस राज्य में हुआ है और अपराधी की जाति या धर्म क्या है, इस आधार पर राजनीतिक दलों के बयान बदलते हैं। जब व्यवस्था और अदालत से लोगों का भरोसा उठने लगता है, तब भीड़ या कैमरे न्याय करने लगते हैं, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी हार है।
प्रशासनिक न्याय का भ्रम
श्रीगंगानगर की घटना के बाद जिस तरह आरोपियों के होटलों पर बुलडोज़र चलाया गया, उसे जनता ने त्वरित न्याय मानकर सराहा। लेकिन हमें गंभीरता से सोचना होगा कि क्या कोई प्रशासनिक कार्रवाई कभी वास्तविक न्यायिक न्याय का विकल्प हो सकती है? यदि कल अदालत साक्ष्यों के अभाव में किसी आरोपी को बरी कर दे, तो क्या ढहाई गई इमारतें वापस आ पाएँगी? इमारतें गिराना आसान है लेकिन अपराधियों को संरक्षण देने वाली मानसिकता को गिराना कठिन है। यदि पुलिस समय पर शिकायत दर्ज न करे, विवेचना कमज़ोर हो और अदालतों में मुकदमे वर्षों लंबित रहें, तो केवल बुलडोज़र चलाकर न्याय का भ्रम तो पैदा किया जा सकता है, वास्तविक न्याय नहीं। न्याय जेसीबी मशीन से नहीं बल्कि निष्पक्ष जाँच, समयबद्ध अदालती सुनवाई और कानून के शासन से मिलता है। जब न्याय का स्थान कानून के बजाय तात्कालिक प्रतीक और राजनीतिक प्रदर्शन लेने लगें, तो वह समाज को एक सभ्य लोकतंत्र से दूर ले जाता है।
विक्टिम ब्लेमिंग, सामाजिक मौन, सामूहिक विफलता
हमारे समाज की सबसे क्रूर बीमारी ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ (पीड़ित को ही दोषी ठहराना) है। किसी भी घटना के बाद पहला सवाल अपराधी से नहीं, बल्कि पीड़ित से पूछा जाता है- वह वहाँ क्यों गई थी, रात में बाहर क्यों थी या उसने क्या पहना था? कपड़ों, मोबाइल या आधुनिक जीवनशैली को अपराध के लिए ज़िम्मेदार ठहराना केवल अपराधियों का बचाव करना है; क्योंकि अपराध वासना से अधिक अपनी सत्ता और नियंत्रण का प्रदर्शन है। जब अपराधी प्रभावशाली होता है, तो समाज, पंचायतें और रिश्तेदार भी ‘लड़की का भविष्य देखने’ या ‘पैसे लेकर मामला रफा-दफा करने’ का दबाव बनाने लगते हैं। अपराधी को सबसे बड़ी ताकत इसी सामाजिक मौन और समझौते की संस्कृति से मिलती है। हम अपने बच्चों को विज्ञान और गणित तो पढ़ाते हैं, लेकिन बेटों को किसी की ‘ना’ का सम्मान करना और सहमति की परिभाषा नहीं सिखाते। जिस दिन हमारा समाज पीड़ित से आख़िरी और अपराधी से पहला सवाल पूछना शुरू कर देगा, उसी दिन हम एक सुरक्षित और सभ्य समाज बनने की दिशा में कदम बढ़ा पाएँगे।
जिस देश में 6 महीने से लेकर 60 और 80 बरस तक की महिलाओं से जबरन संबंध बनाए जाने की घटनाएँ जब आम हो चली हों तो यह भी जाहिर है कि हर बार की तरह यह घटना भी जल्द भुला दी जाए। जब “स्तन पकड़ना और नाड़ा तोड़ना, रेप की कोशिश नहीं” जैसे स्टेटमेंट प्रतिष्ठित इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के मुंह से निकले तो उस देश में महिलाओं की स्थिति को लेकर किया ही क्या जा सकता है?
ऐसी ही एक और टिप्पणी जब सुनने को मिली कि “यदि बलात्कार रोक नहीं सकते, तो लेट जाओ और मज़े लो।” उस टिप्पणी पर कुछ लोग हँस भी रहे थे। मुझे आज भी वह दृश्य याद है। उस दिन समझ आया कि बलात्कार केवल अपराधियों की समस्या नहीं है; समस्या उन हँसते चेहरों की भी है जो ऐसी भाषा को मनोरंजन समझ लेते हैं। जिस समाज में ऐसी हँसी सहज हो जाए, वहाँ अपराधी अकेले पैदा नहीं होते बल्कि उन्हें वातावरण भी मिलता है।
यह उस समाज का आईना है जिसमें हम रहते हैं। एक ऐसा समाज जो तकनीक में आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था पर गर्व कर रहा है, अंतरिक्ष की बातें कर रहा है लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षित बचपन देने का भरोसा अब भी नहीं दे पा रहा। यह केवल एक बच्ची की कहानी नहीं है। यह उस पूरे समाज की कहानी है जहाँ देह पर होने वाला हमला, अंततः आत्मा पर सबसे गहरा प्रहार बन जाता है।
मुझे कई बार लगता है कि हमारे यहाँ अपराध से ज़्यादा ‘अपराध की दृश्यता’ पर बहस होती है। यदि मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गया, तो पूरा देश बोलने लगता है। यदि वही घटना किसी छोटे कस्बे या गाँव में हुई हो, तो वह दो दिन बाद अख़बार के अंदरूनी पन्ने में सिमट जाती है। क्या किसी बच्ची का दर्द दिल्ली और श्रीगंगानगर में अलग-अलग होता है? क्या किसी लड़के के साथ हुआ यौन शोषण इसलिए कम दर्दनाक हो जाता है कि वह लड़का है? क्या ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ हुई हिंसा इसलिए कम अपराध है कि उसके लिए टीवी स्टूडियो में बहस नहीं होती? इन सवालों के जवाब हम सब जानते हैं। फिर भी हम उन्हें सुनना नहीं चाहते।
आखिर किसकी जिम्मेदारी है?
एक और बात मुझे बार-बार परेशान करती है। हम हर बड़ी घटना के बाद कहते हैं- “जानवरों से भी बदतर हैं ऐसे लोग।” लेकिन सच यह है कि जानवर अपनी जैविक प्रवृत्ति से चलते हैं। योजनाबद्ध क्रूरता, सत्ता का प्रदर्शन, हिंसा का आनंद और सबूत मिटाने की कोशिश- ये सब मनुष्य करता है। इसलिए अपराधी की तुलना जानवर से करना शायद जानवरों के साथ भी अन्याय है।
समस्या यह है कि हमने अपराध को केवल कानूनी प्रश्न मान लिया है, जबकि यह गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक संकट का भी संकेत है। जब घरों में लड़कों को बचपन से यह नहीं सिखाया जाता कि ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ होता है, जब स्त्री को बराबरी नहीं बल्कि नियंत्रण की वस्तु समझा जाता है, जब अश्लील टिप्पणियों को ‘लड़कों की शरारत’ कहकर टाल दिया जाता है, तब बड़े अपराध अचानक पैदा नहीं होते; वे धीरे-धीरे उसी वातावरण में पलते हैं। यही कारण है कि हर बलात्कार केवल एक एफआईआर नहीं होता। वह समाज के चरित्र पर दर्ज एक टिप्पणी भी होता है। और शायद इसीलिए मुझे लगता है कि कानून जितना अदालतों में लिखा जाता है, उससे कहीं अधिक वह परिवारों, स्कूलों और समाज के व्यवहार में लिखा जाता है। यदि वहाँ बदलाव नहीं आया, तो हर नया कानून भी अधूरा साबित होगा।







