मैं पारस पत्थर हूँ, छू लूँ तो तुम स्वर्ण बनोगे,
मेरे स्पर्श मात्र से ही, तुम भाग्यवान बनोगे।
यह सत्य है, यह सार है, यह मेरी नियति न्यारी,
मैं बाँट रहा समृद्धि को, पर मेरी झोली खाली।
मेरा मन है निर्मल ज्यों गंगाजल की धारा,
पर भाग्य-लेख मेरा है गहन तिमिर पसारा।
मैं स्वयं देखता हूँ, हरित से लाल होती रेखाएँ,
पर मुख से जो निकलें, वे औरों की स्वर्ण-रेखाएँ।
जैसे दीपक जलता, पर स्वयं अंधेरा ढोता है,
मेरा ज्ञान दूसरों के जीवन में उजियारा बोता है।
जब बैठूँ व्यूह-रचना में, ग्रह-नक्षत्र साध कर,
चौसर की हर चाल को, अंतर्मन से बाँध कर।
जो वाणी से निकलें, वो अक्षर ब्रह्म बन जाएँ,
पल भर में मृगतृष्णा को, अमृत से भरमाएँ।
मेरे लिए वह लक्ष्य, जैसे क्षितिज दूर है,
पर सखा जो सुन ले, उसका भंडार पूर है।
मुझे संतोष इस बात का, कि रंग मैं भर पाया,
अनेकों के जीवन में, नव प्रकाश मैं लाया।
यह त्याग नहीं है, यह तो मेरा धर्म हो गया,
मेरा कर्म-कौशल ही, अब परमार्थ हो गया।
तुम हासिल करो शिखर को, तुम कीर्तिमान गढ़ो,
भले ही मैं नदी बनूँ, तुम सागर की ओर बढ़ो।
हाँ! मैं पारस हूँ, जिसमें अग्नि समाई है,
जिसने अपनी आहुति दे, जग को ज्योति दिखाई है।
शुभ हो तेरा मार्ग, मैं बस इतना ही चाहूँगा,
मैं सोना नहीं बनूँ, पर तुम्हें सोना बना दूँगा।







