आँखों में अश्रु ठहरे हैं
ये ज़ख़्म बहुत ही गहरे हैं
हम कब तक सहते जाएंगे
यूँ जीते जी मर जाएँगे
जीवन को खोकर आए हैं
एक ऐसी ठोकर खाए हैं
नहीं अपनी मौत गया कोई
आतंक की भेंट चढ़ाए हैं
थे गए साथ पर छूट गए
सारे सपने ही टूट गये
वो कैसे ये सह पाएँगे
बिन अपनों के रह पाएंगे
आतंक की कोई जात नहीं
कोई धर्म नहीं जज़्बात नहीं
आतंकी बस आतंकी हैं
इन्हें ख़त्म करो अब बात नहीं
इनको बिलकुल भी शर्म नहीं
इनका कोई भी धर्म नहीं
इनको कोई दर्द नहीं होता
क्यूं चेहरा ज़र्द नहीं होता
इनके भी तो अपने होंगे
उनके भी कुछ सपने होंगे
जब दर्द कोई उनको होगा
तो क्या ये सब सह पाएँगे?
अब नहीं जीना है डर डर के
नहीं चल पाएंगे मर मर के
अब नामो निशां ना रहे इनका
बस यही नारा है हर घर से







