शब्दों की अपनी हस्ती है
शब्दों की अपनी मस्ती है
कहीं पर ये मीठी मिसरी से
कहीं पर चिंगारी तपती है
शब्दों पे नहीं कोई पहरे
शब्दों के घाव बड़े गहरे
ये तलवारों का काम करे
इनपे ना कोई मरहम ठहरे
कुछ (ऐसा) सोचते हैं लेकिन मेरी सोच यूँ है
शब्दों की ना कोई हस्ती है
शब्दों की ना कोई मस्ती है
शब्दों को तुम ही चुनते हो
झलक तुम्हारी बसती है
अपना अस्तित्व जताने को
अच्छे शब्दों को चुनते हो
शब्दों की महिमा गा गा कर
सुंदर भाषा में बुनते हो
शब्दों पर शब्द मुखर करके
तुम शब्दों पे भिड़ जाते हो
शब्दों को शब्दों से छलकर
अपना परचम फहराते हो
तुम खुद शब्दों को चुनचुन कर
अपनी जिव्हा पर रखते हो
शब्दों का जुबां से मेल नहीं
पर दोष उन्हीं पर धरते हो
ये दोष नहीं है शब्दों का
तुम खुद शब्दों के दोषी हो
शब्दों का मर्म ना समझ सको
तो चुन लो तुम खामोशी को ।







