हाथों पर बिछे जाल को
तकदीर के फंदों से बुनती,
माथे पर उमड़ी सिलवटों में
उलझनों के जाल फैलाती;
चेहरे पर उकेरी झुर्रियों में फंसी,
अकुलाई, कहीं दुबकी बैठी
उम्रदराज बेबसी को दर्शाती-
यह लकीरें।
जमीन पर उतर आएं तो
घरों को बांट देती हैं यह,
दिलों को चुभ जाएं तो
रिश्तों को काट देती हैं,
अमीरी और गरीबी के बीच की
खाई सी, हर पल गहराती
सामाजिक विभाजन की-
यह लकीरें।
लकीरें काटती हैं, बांटती हैं,
ढल जाती हैं बखूबी
वास्तुकला की नींव में भी;
लकीरों ने ही अहसास बन
लिखी अमर प्रेम पाती;
लकीरें ही उभरी महाकाव्य बन,
उन्हीं ने रची चित्रकलाएं मनोहारी।
ढाल सुरक्षा की बन आ खड़ी हुई
खींची गई जब
लक्ष्मण-रेखा सरीखी;
दुविधा की बेड़ी भी बन
पांवों को जकड़ वहीं बैठ गईं
विचलित मर्यादा के संग-
यह लकीरें।
पूर्वाग्रहों की पक्षधर हो,
लकीरें काटती हैं
विचारधाराओं के सहज प्रवाह को
कलम की पैनी नोंक से;
बांट देती हैं सरहदों पर
सांझी धरोहर के प्रतीकों को,
बेकस परिवारों को
निर्मम तलवार की धार से।
रिश्तों को नकारती हैं यह
शंका, अविश्वास,
ईर्ष्या और अहंकार की लिखाई से;
फिर भी आदि से
अपनी लकीरों को बढ़ाने की जगह,
लकीर का फकीर बन,
लगा रहा है हर इंसान,
कतरनें, मिटाने-
वही लकीरें
जब-जब दूसरों की खींची,
उसे दिखीं वे जमीन में
खुद की जड़ें जमाती।







