कि चारों दिशाओं में
केवल चक्र ही चक्र है।
समय के अनंत प्रवाह के संग
घूमता हुआ कुछ और भी है—
जिसके एक छोर पर
हस्तिनापुर का उत्कर्ष है,
और दूसरे छोर पर
उसका अवश्यंभावी पतन।
एक चक्र द्रौपदी में जीवित है—
जो जन्म ले चुका है
नारी के अपमान,
और सभ्यता के निर्वसन के लिए।
एक चक्र वह भी है
जो धृतराष्ट्र की अंतर्दृष्टि को
पुत्रमोह के घने जाल में
स्वार्थ की अंधी पट्टी से बाँध देता है।
एक चक्र महान धनुर्धर अर्जुन को
रणभूमि में
कर्तव्य और करुणा के बीच
मोहपाश में जकड़े रखता है।
एक चक्र वह है
जो वीर अभिमन्यु को
निरंतर अपनी ओर खींचता जाता है—
और अंतिम श्वास तक
वही रथचक्र
शत्रुओं के प्रहारों के मध्य
ढाल बनकर घूमता रहता है।
एक चक्र वहाँ भी है
जहाँ दानवीर कर्ण
रण के मध्य
धरती में धँसे
अपने रथ के पहिए से
संघर्ष करता दिखाई देता है।
एक चक्र वहाँ भी विद्यमान है
जहाँ प्रतिज्ञा में बँधे
विवश पितामह भीष्म
शरशय्या पर लेटे
मृत्यु को रोककर
काल से साक्षात्कार करते हैं।
और एक चक्र वह भी है—
जो निरंतर घूमता चला जा रहा है,
सदियों से अब तक,
प्रारब्ध और कर्म के बीच,
जन्म और मृत्यु के मध्य।
जिसे धारण किए हुए हैं
स्वयं नारायण—
जिसके भीतर ही समाहित है
संपूर्ण सृष्टि का
प्रारंभ और अंत।





