ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
सारी रिवायतें यूँ निभाते चले गये
ख़ुद के वज़ूद को ही भुलाते चले गये
आँखों में जज़्ब कितने समंदर रहे मगर
औरों के अश्क़ फिर भी उठाते चले गये
ये पूछते हैं आप कि हमने दिया है क्या
कुछ ख़्वाब ही थे पास, लुटाते चले गये
इस दिल को ऐसी आप से निस्बत-सी हो गयी
शिक़वे थे आपसे वो छुपाते चले गये
निकली है बात आज तो कहने भी दो ‘किरण’
हमको दिया है क्या जो जताते चले गये
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ग़ज़ल-
सफ़र ज़िन्दगी का रुका भी नहीं है
मगर फ़ासले पर कज़ा भी नहीं है
ज़ुबाँ पर न आया था लफ़्ज़-ए-मुहब्बत
मगर राज़-ए-उल्फ़त छुपा भी नहीं है
निभाते हैं हम दोस्ती दोस्तों से
जो बिगड़े तो हम से बुरा भी नहीं है
गुज़ारिश थी दिल की उन्हें भूल जाएँ
मगर ख़ुद उन्हें भूलता भी नहीं है
शबे-वस्ल थी पर सहर हिज़्र लायी
‘किरण’ वो मिला पर मिला भी नहीं है
– विनिता सुराना किरण






