ग़ज़ल
ग़ज़ल
कहीं यादों में भी ज़िंदा, कहीं तिल-तिल मरे रिश्ते
कभी ठहरे थके से ये, कभी मीलों चले रिश्ते
कभी है ज़र्द पत्तों से, कभी फूलों से महके हैं
बदलते वक़्त के हाथों बदलते ही रहे रिश्ते
दिलों में दूरियाँ हो तो ये अश्क़ों में डूबाते हैं
मगर विश्वास हो दिल में बनाते पुल नए रिश्ते
सुकूँ देते ये शबनम से, कभी मरहम से लगते हैं
अगर दे ज़ख्म अपने ही तो शूलों से चुभे रिश्ते
तिमिर की आहटों से जब सहम जाता कभी ये दिल
किरण से तब दमकते हैं, लगे सूरज से ये रिश्ते
******************************************
ग़ज़ल
प्यार नहीं वो ख़ार चुनेंगे
संगदिल बस प्रतिकार चुनेंगे
उन्हें मुबारक़ नफ़रत उनकी
उल्फ़त हम हर बार चुनेंगे
जिनकी फ़ितरत ज़हर उगलना
वो कब रस की धार चुनेंगे?
धान भरा हो खलिहानों में
फंदा क्यूँ बेकार चुनेंगे
ज़ुल्म सहेंगे कब तक आख़िर
वो ख़ंजर हथियार चुनेंगे
सच का नशा हो तारी जिन पर
फ़ूल नहीं अंगार चुनेंगे
भूलेगा औक़ात पड़ौसी
हार नहीं फ़िर वार चुनेंगे
किरण सहर को रोशन करती
जुगनू पर अंधियार चुनेंगे
**************************
ग़ज़ल
तीरगी में ज़िया के जैसा है
उसका मिलना दुआ के जैसा है
इश्क़ उससे, ख़ता के जैसा है
हाँ, मगर वो ख़ुदा के जैसा है
आशना है वो रूह से मेरी
रुहअफ़ज़ा, ग़िज़ा के जैसा है
अब न परवाह ज़ख़्म की कोई
दर्द में वो दवा के जैसा है
हो करम इतना लौट आए वो
उसका जाना सज़ा के जैसा है
है तज़ल्ज़ुल ये ज़िन्दगी मेरी
पुरसुकूं वो शफ़ा के जैसा है
बारहा धूप से जली है किरण
वो तपिश में सबा के जैसा है
ज़िया- रौशनी, आशना- मित्रता, रुहअफ़ज़ा- जीवन बढ़ाने वाला, गिज़ा – ख़ुराक
तज़ल्ज़ुल- ज़लज़ला/अस्थिरता, शफ़ा- किनारा, सबा – हवा
– विनिता सुराना किरण






