कविता-कानन
दिल है कि
कवि केदारनाथ सिंह की कविता का
वह बाघ
जो मिट्टी का था
जो टूट गया
जिसके लिए फूट-फूटकर रो रहा लड़का
मान नहीं रहा
दूसरे बाघ के लिए
उसे चाहिए
वही बाघ
जबकि उसे उससे अच्छा बाघ
दिलाने को बार-बार कहा
लड़का मासूम है
लड़का घाघ नहीं है
उसके लिए
मिट्टी का बाघ
मिट्टी का बाघ नहीं है
कि ला दोगे दूसरा
ऐसा प्रेम और दोस्ती-भरा
लड़के से
लाख कहो
बाघ की उतनी ही आयु थी
बाघ स्वर्ग गया
बाघ फिर जनम लेगा
और तुमसे नये रूप में मिलेगा
बाघ नहीं है तो क्या
बाघ की स्मृतियां तो हैं
उसकी स्मृतियां
तुम्हारी ताक़त बनेंगी
लड़के से लाख कहो
संयम रखो
लेकिन लड़का है कि
संयम जानता नहीं
गोया, वह लड़का नहीं, दिल है
और दिल है कि
मानता नहीं
जो मेरा ही क्यों न हो !
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साहित्य- कला-संस्कृति वाले
जिन्होंने
सस्ती कलम से
मूल्यवान कविताएँ लिखी हैं
जिन्होंने
सस्ती कूची से
सस्ते कैनवास पर
सुंदर चित्र बनाये
उनको मेरा सलाम !
वे अलक्षित हैं
वे एक किनारे कर दिये गये हैं
उनकी जगह
बाज़ार से बाहर है
उनके बिना भी
साहित्य-कला-संस्कृति की ज़रूरतें
पूरी हैं
संस्कृति के हित संरक्षित हैं
एक दिन
उन्हें जनता अपनाएगी
उनके कामों पर
अपना प्यार लुटाएगी
उस दिन ये
साहित्य-कला-संस्कृति वाले
इस अपनत्व और प्यार को
बाज़ार देंगे
और बाज़ारू बना देंगे।
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कुछ मज़ा जो आ रहा है
पानी बरबाद हो रहा है
पाताल से दोहन स्वरूप
आ रहा है जो
इसलिए
मन में विषाद हो रहा है
भूल गया है दो घर बाद का पड़ोसी
पंप चलाकर
छत का एक कोना
पानी से भर गया है
कुछ मज़ा जो आ रहा है
वह इस नाते कि
कबूतरों का एक झुंड
नहा रहा है
अठखेलियाँ करता
– केशव शरण




