कविता-कानन
कविता- बहरा भालू
टिकटिक चलती घड़ी बाँधकर
घर से निकला भालू,
तभी राह में उसे मिल गया
गधा बड़ा ही चालू।
बोला- “समय बता दो भैया
मैं जाता हूँ मेला,”
भालू बहरा था बोला- “मैं
कहाँ खा रहा केला?”
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कविता- लड्डू गप्प-गप्प
खाओ लड्डू गप्प-गप्प,
लो रसगुल्ला हप्प-हप्प।
रबड़ी और मलाई लो,
चमचम और मिठाई लो।
खूब मज़े से खाओ जी,
नहीं देख ललचाओ जी।
पापा जी जब आएँगे,
तब पैसे दे जाएँगे।
– डाॅ. मोहम्मद साजिद ख़ान




