कविता-कानन
कविता- होगा घर मेरा भी प्यारा
एक पंख जो उड़कर आया,
मैंने उसको दोस्त बनाया।
पूछा, “पंख कहाँ से आए,
सुन्दर रंग कहाँ से पाए?
बोला पंख ज़रा-सा हिलकर,
“कल तक माँ की देह लगा था।
छूट वहीं से उड़कर आया,
तुम्हें मिलूंगा क्या पता था।
तब तो दु:खी बहुत तुम होंगे,
माँ की याद सताती होगी।
चलो सजा दूँ अपने घर में,
माँ मेरी ख़ुश कितनी होगी!
बोला पंख ज़रा फिर हँसकर,
“धन्यवाद है मित्र तुम्हारा।
चलो सजा दो मुझको घर में
होगा घर मेरा भी प्यारा।”
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कविता- कितने फूल
कितने अच्छे हो न वृक्ष
सजा दी है तुमने तो
मेरी छोटी-सी खिड़की पर
एक छोटी-सी टहनी
फूलों से लदी!
कितना मज़ा आता है न मुझे
देख-देख कर इसे!
हिलाते हो तो
और भी मज़ा।
देखने तुम्हें आऊंगी
पूरा का पूरा!
अभी बीमार हूं न?
नहीं निकल सकती
दरवाजे के बाहर,
माँ मना जो करती है!
पर आऊंगी
ज़रूर आऊंगी तुम्हें देखने
पूरा का पूरा!
अच्छा बताओ तो गिनकर
कितने फूल आए हैं
इस बार तुम पर?
– दिविक रमेश




