कविता-कानन
कविता- बचपन
बचपन कच्ची पगडण्डी
मानो उड़ती धूल,
घने अँधेरे जंगल में
ये उजास के फूल।
बादल काला दौड़ लगाये
आसमान के पार,
ताक-झाँक के देख रहा है
धरती का संसार।
नए परिंदे ढूँढ रहे हैं
असमानी वो रंग,
छोड़ कहाँ आये वो सपने
जाने किसके संग।
नन्हें-मुन्ने बना रहे हैं
एक नयी पहचान,
फ़ैल रही है हर होठों पर
मीठी-सी मुस्कान।।
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कविता- एक कहानी प्यारी
सोच रहा हूँ लिख ही डालूँ
एक कहानी प्यारी,
होंगे उसमें भालू , बन्दर
और गोरैया न्यारी।
एक छोटा बागीचा होगा
होंगे उसमें फूल,
मीठे फल और सुन्दर तितली
अरे! गया मैं भूल।
एक नदी बहती होगी
और होगा उसमें पानी,
नन्हें बन्दर करते होंगे
फिर कोई शैतानी।
भालू और गोरैया की
होगी पक्की यारी,
भेदभाव ये नहीं जानते
ना ही दुनियादारी।
– अनुप्रिया





