कविता-कानन
कविता- नटखट राजू
राजू बड़ा है नटखट
चलता हरदम झटपट,
इधर भी जाये उधर भी जाये
धमा चौकडी खूब मचाये।
लाल, हरी, पीली बत्ती को
केवल खेल समझता,
बिन देखे ट्रैफिक सिग्नल को
सड़कों पर भागा फिरता।
चोट लगी जब इक दिन उसको,
तब रोया चिल्लाया,
कान पकड़कर की उठ-बैठक,
फिर खुद को समझाया।
नही करूँगा कभी शरारत
बायें रस्ते से जाऊँगा,
पहुँच के अपनी मंजिल ही,
अब मैं मौज मनाऊँगा।
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कविता- उलहना
चूँ-चूँ करती आई चिडिया
देने आज उलहना,
स्वच्छ बनाओ पर्यावरण
वरना रह जाओगे तनहा।
तड़प रही हूँ मैं जैसे
तुम भी इक दिन तड़पोगे,
नहीं मिलेगा दाना-पानी
बूंद-बूद को तरसोगे।
मिट जायेगा अस्तित्व हमारा
कोई जान न पायेगा।
धरती होगी बंजर और
गगन अम्ल बरसायेगा।
रुक जाओ तुम मान लो कहना
पेड़ हरे मत काटो।
जीवन है अनमोल, नहीं तुम
टुकड़ों में बाटो।
बच्चों तुम आधार हो
इस जीवन बगीया के।
पेड़ लगाओ, जीव बचाओ
इस सुन्दर दुनिया के।
महक उठेगा जब उपवन
तब तुम मुझसे कहना।
चूँ-चूँ करती आई चिडिया
देने आज उलहना।।
– अजय कुमार मिश्र अजयश्री




