भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता है। यहाँ स्त्री को “शक्ति”, “माँ” और “देवी” के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। कैसी विडंबना है कि एक ओर तो हम ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ जैसे संस्कारी वाक्यांश का उद्घोष कर फूले नहीं समाते हैं, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों के विरुद्ध घटित आपराधिक मामलों के आँकड़े इस खोखले आदर्श का पर्दाफाश कर देते हैं। तत्काल ही यह गौरव एक गहरे अफसोस में बदल जाता है। यह विरोधाभास हमारी दिखावापसंद और भ्रामक सामाजिक संरचना में गहरे धँसे संकट का परिचायक है। क्योंकि असल जीवन में तो स्त्री का अस्तित्व भय, हिंसा और असुरक्षा के बीच ही झूल रहा है।
भारतीय संविधान ने आरंभ से ही स्त्री-पुरुष समानता को राष्ट्र की मूल आत्मा के रूप में स्वीकार किया है। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 15 राज्य को लिंग के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है और साथ ही महिलाओं के पक्ष में विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, एक ऐसा जीवन जो केवल अस्तित्व तक सीमित न हो, बल्कि गरिमा और सुरक्षा से परिपूर्ण हो। किंतु जब हम वर्तमान परिदृश्य को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि इन संवैधानिक आश्वासनों और सामाजिक यथार्थ के बीच एक गहरी खाई विद्यमान है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े न केवल इस दोहरे चरित्र को स्पष्ट करते हैं बल्कि इस संकट की भयावहता को भी रेखांकित करते हैं।
वर्ष 2024 में देशभर में स्त्रियों के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए, जो प्रतिदिन लगभग 1200 मामलों के बराबर है। जाहिर है कि यह संख्या केवल पंजीकृत घटनाओं की है। सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा और न्यायिक प्रक्रिया पर अविश्वास के कारण अनेक घटनाएँ तो परदे के पीछे ही दम तोड़ देती हैं। “ये आँकड़े केवल संख्या नहीं बल्कि समाज की नैतिक दिशा का सूचकांक भी होते हैं और यह सूचकांक लगातार गिरावट की ओर संकेत कर रहा है।”
यौन हिंसा के संदर्भ में स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 30,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं और इनमें से अधिकांश मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित होता है। यह तथ्य इस धारणा को खंडित करता है कि खतरा केवल बाहरी दुनिया से है।
इसी वर्ष मार्च-अप्रैल में वाराणसी में एक 19 वर्षीय युवती के साथ 20 से अधिक व्यक्तियों द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई, जिसमें उसे नशीला पदार्थ देकर कई दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर प्रताड़ित किया गया। यह घटना केवल अपराध नहीं, बल्कि संगठित अमानवीयता और क्रूरता की पराकाष्ठा है। इसी प्रकार अप्रैल में नैनीताल में 12 वर्षीय बच्ची के साथ 73 वर्षीय व्यक्ति द्वारा यौन शोषण की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकृति की कोई आयु-सीमा नहीं होती। यह घटना उस सामाजिक विघटन को उजागर करती है, जहाँ नैतिकता और मानवता दोनों ही असफल हो जाती हैं।
अभी जुलाई में भी कर्नाटक के धर्मस्थल से जुड़े आरोपों ने समाज को झकझोर दिया, जब एक पूर्व सफाई कर्मचारी ने दावा किया कि 1995 से 2014 के बीच सैकड़ों महिलाओं और नाबालिगों के शवों को दफनाया गया, जिनकी कथित रूप से यौन हिंसा के बाद हत्या की गई थी। इन आरोपों के बाद कई स्थानों पर खुदाई कर जांच प्रारंभ की गई। यह सब संस्थागत विफलता और दीर्घकालिक अपराध-संस्कृति का संकेत नहीं तो और क्या है?
इन घटनाओं का समग्र विश्लेषण यह दर्शाता है कि स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा कोई आकस्मिक या पृथक समस्या नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक समस्या है। NCRB के अनुसार, स्त्रियों के विरुद्ध अपराधों में सबसे बड़ा हिस्सा “पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता” का है जो कुल मामलों का लगभग एक-तिहाई है। इसके बाद अपहरण, शील भंग करने के उद्देश्य से हमला और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध आते हैं। इसका अर्थ यह है कि स्त्री के लिए सबसे असुरक्षित स्थान प्रायः उसका अपना घर ही बन जाता है- वह स्थान, जिसे सुरक्षा और विश्वास का प्रतीक होना चाहिए।
यह समस्या केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है; इसकी जड़ें इतिहास में भी गहराई तक फैली हैं। 2012 का दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड (निर्भया प्रकरण) भारतीय समाज के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण था, जिसने व्यापक जनआक्रोश को जन्म दिया और इसके चलते कानूनों में महत्वपूर्ण संशोधन भी किए। किंतु एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अपराधों की संख्या में अपेक्षित कमी नहीं आई। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; बनाने के साथ-साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन, उन पर भरोसा और सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन अनिवार्य है।
देखा जाए तो पितृसत्तात्मक सोच इस समस्या के मूल में स्थित है। इस दृष्टिकोण में स्त्री को स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि नियंत्रण और मर्यादा के दायरे में देखा जाता है। यह दृष्टिकोण संविधान की उस भावना के विपरीत है, जो प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और गरिमा प्रदान करता है। इसके साथ ही “विक्टिम ब्लेमिंग” की प्रवृत्ति (जहाँ पीड़िता को ही दोषी ठहराया जाता है) समस्या को और जटिल बना देती है। यह न केवल न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि पीड़िता के मानसिक और सामाजिक पुनर्वास में भी बाधा उत्पन्न करती है।
न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति भी एक गंभीर चुनौती है। आँकड़े बताते हैं कि अभी भी देश में बलात्कार और POCSO से जुड़े 2.5 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जो यह दर्शाता है कि त्वरित न्याय का वादा फिलहाल अधूरा है।
सीधी सी बात है कि जब मामलों का निपटारा वर्षों तक लंबित रहता है, तो यह पीड़िताओं के लिए भले ही अंतहीन पीड़ा का विस्तार बनता जाए पर अपराधियों के लिए तो अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन की तरह ही काम करता है। न्याय में देरी, वस्तुतः न्याय से वंचित करने के समान है।
इसके अतिरिक्त, आधुनिक समय में साइबर अपराधों का बढ़ता स्वरूप भी एक नई चुनौती के रूप में सामने आया है। डिजिटल युग में स्त्रियों की निजता और गरिमा पर आक्रमण के नए तरीके विकसित हो रहे हैं। ऑनलाइन उत्पीड़न, डिजिटल स्टॉकिंग और निजी सामग्री का दुरुपयोग,जैसे अपराध स्त्रियों की निजता और गरिमा पर नए प्रकार के हमले हैं, जिनके लिए समाज और कानून दोनों अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
समाधान की दिशा में विचार करते समय यह स्पष्ट हो जाता है कि केवल दंडात्मक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। सबसे पहले तो हर समस्या को राजनीतिक चश्मे से देखने वाले, हिन्दू-मुस्लिम पक्ष ढूँढने वाले समाज को इस निम्न मानसिकता से ऊपर उठना होगा। उसके भीतर संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी होगी। साथ ही शिक्षा प्रणाली में लैंगिक समानता, सम्मान और सह-अस्तित्व के मूल्यों को प्रारंभिक स्तर से ही शामिल किया जाना चाहिए। परिवारों में बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि सम्मान, सहानुभूति और समानता किसी भी स्वस्थ समाज के आधार हैं। मीडिया को भी किसी खास दल का भोंपू बनने के बजाय अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी चाहिए, ताकि वह स्त्रियों के प्रति सम्मानजनक और सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सके।
इसके साथ ही, पुलिस और न्यायिक तंत्र में सुधार अत्यंत आवश्यक है। त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना, मामलों की समयबद्ध सुनवाई और डिजिटल साक्ष्यों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता, आर्थिक समर्थन और सामाजिक पुनर्स्थापन की समुचित व्यवस्था भी अनिवार्य है।
अंततः बात केवल कानून और व्यवस्था की नहीं, नैतिकता और मानवता की भी है। किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड यह नहीं है कि वह कितना विकसित है, बल्कि यह है कि वह स्त्रियों को कितना सुरक्षित, स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। यदि स्त्रियाँ भय और असुरक्षा के बीच जीवन जीने को विवश हैं, तो यह उनकी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता है। क्योंकि जब भय सामान्य हो जाए और संवेदना असामान्य, तब यह केवल अपराध की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि समाज और सभ्यता के नैतिक पतन का दुखद दस्तावेज बन जाती है।
इसलिए इन घटनाओं पर केवल शोक और आक्रोश पर्याप्त नहीं हैं। समाज में ठोस परिवर्तन की आवश्यकता है। एक ऐसे परिवर्तन की, जो केवल कानूनों में नहीं, बल्कि हमारी सोच, व्यवहार और हमारी सामूहिक चेतना में परिलक्षित हो।
अतः मूल प्रश्न यह नहीं है कि अपराध क्यों हो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या समाज और राज्य अपने संवैधानिक दायित्वों के प्रति ईमानदार हैं? कहीं पूर्व की पीढ़ियों पर हर समस्या का ठीकरा फोड़ने और अपराधियों को प्रश्रय देने की राजनीति ही तो समस्या के समाधान में बाधक नहीं है? जो भी हो पर यह सच है कि जब तक स्त्रियाँ निर्भय होकर जीवन नहीं जी पातीं, तब तक विकास, प्रगति और सभ्यता के सभी दावे अधूरे रहेंगे और समाज अपने नैतिक मूल्यों के परीक्षण में शून्य अंक लाकर निरंतर अनुत्तीर्ण ही होता रहेगा।







