द्रोण का आदर्श भी
एक मोल से मैला हुआ
मलिन मन उस मैल से
गंदा पड़ा है आज भी…
मोल पर इतिहास भी
तब मौन होकर रह गया
जब गुरु का गौरव भी
गुमनाम होकर रह गया …
बिन गुरु, तिरस्कार भी
पर धनुर्धर था श्रेष्ठतम
दक्षिणा क्यों माँगना
जब दायरा था न्यूनतम…
उदय होता सूर्य भी
अस्त छल से हो गया
बिखरी किरणें आज भी
उपहास करती रह गयीं…
अतीत में दबा हुआ
किरदार जिंदा आज भी
प्रश्न करता दिख रहा
गुरुओं से गुरुकुल धाम की…







