1. सार्वजनिक शौचालय
सार्वजनिक शौचालयों की दीवारें इन दिनों,
साफ सुथरी नजर आती हैं,
उन पर नहीं दिखती,
किसी का नाम लेकर लिखी गई,
अभद्र शब्दों में की गई टिप्पणियां
मन की निम्नतर ख्वाहिशों को पोषित करती
गन्दी और अश्लील कहानियां
पेंसिल और बाल पेन से बनाए गए,
अधकचरे से कामोत्तेजक से चित्र,
लेकिन फिर भी खत्म नहीं हुए हैं
वो सारे चित्रकार और लेखक,
उस सार्वजनिक शौचालय की भौतिक दीवार को छोड़कर
वो सब आ गए है
एक आभासी शौचालय की दीवार के पास,
छद्म नाम और छद्म पहचान के साथ,
सोशल मीडिया के शौचालय में,
उसी तरह छुपे हुए ताला लगी प्रोफाइलों के पीछे,
हमारे मनो के सारे निम्नतम विकारों ने,
अपनी सारी नीचता की पराकाष्ठाओं का
आधुनिक डिजिटलीकरण कर लिया है…
2. प्रेम कविता
चांद नहीं तोड़ पाया कभी,
ना ही खुल सकी मुझसे चांदनी की परतें,
तपती दोपहरी में शाम की ठंडक नहीं उतार पाया कभी,
ना ही रात को कर सका आज़ाद उसके अंधेरों से ही,
सुबह से नहीं छीन पाया उसके सांझ में ढलने का इंतजार को भी,
प्रेम पत्र दुनिया की सबसे कीमती वस्तु नहीं लगे कभी,
ना ही उनके चोरी होने के भय ने ही सताया,
और ना ही हो सके मुझसे रूह और जिस्म,
अलग-अलगप्रेम की रूहानी अनुभूति के अनुभव लिए,
प्रेम कविता के तमाम आयामों को छूने में
अनुत्तीर्ण सा रहने पर भी
ना जाने कैसे
सहज ही फूट पड़ती है
मेरे अंतर्मन में प्रेम की धाराएं, जब कभी देर से घर आने पर,
मेरे खाने की थाली के पास ही तुम्हारी थाली भी मेरे इंतजार में ठंडी हो रही होती हैं,
जब भी बाजार में तुम्हारी मितव्ययी राशन लिस्ट की वस्तुएं लेते,
अनायास ही तुम्हारे हाथ बढ़ जाते है,
मेरी पसंद की किसी ब्रांडेड वस्तु की तरफ,
जब रात को सोते हुए अचानक ही मेरे वजूद को
तुम्हारे आलिंगन की चादर अपने गुनगुने स्पर्श से ढक लेती है,
तुम्हारे साथ होने भर को महसूस करते ही बहता है,
मेरे रोम रोम में,
नैसर्गिक सा निश्चल प्रेम…






