ज़िंदगी की धूप छांव
कभी नर्म है
कभी गर्म है
जो मिला मुझे
मेरा भाग्य था
जो नहीं मिला वो कर्म है
ज़िंदगी स्टेशन है रेल का
कोई मिल गया
कोई बिछड़ गया
जो चला गया
वो ठीक था
पर उसे रोकना मेरा धर्म है
ज़िंदगी नीड़ परिंदे का
कभी बस गया
कभी उजड़ गया
कुछ नहीं है
तेरे हाथ में
यही तो जीवन का मर्म है






