वो ही है
वो सब से अलग है, वो सबसे जुदा है
वो ही ईश है और वो ही खुदा है
है कण कण में वो ही है कण कण उसी से
बता क्या है ऐसा जो उससे जुदा है
परिन्दों चरिन्दों में उसकी चहक है
फूलों की ख़ुशबू में उसकी महक है
गेहूँ की बाली में उसकी लहक है
ये ग़र वो नहीं है तो फिर और क्या है
सितारों की झुरमुट में उसकी चमक है
चाँद की चाँदनी में भी उसकी दमक है
घिर रही इन घटाओं में उसकी घमक है
ये गर वो नहीं है तो फिर और क्या है
उड़ रहे इन परिंदों की परवाज़ है वो
बोलते इन लबों की आवाज़ है वो
हैं अकेले सभी सबका हमराज़ है वो
ये गर वो नहीं है तो फिर और क्या है
ये ऊँचे पहाड़ों में बसता वो ही है
झरनों की कल कल में हँसता वो ही है
बह रही है हवाएँ हुलसता वो ही है
ये गर वो नहीं है तो फिर और क्या है
ये सृष्टि है उसकी चलाता वो ही है
ये दृष्टि भी उसकी दिखाता वो ही है
ये जीवन का झूला झुलाता वो ही है
ये वो ही है उसके सिवा और क्या है
जीवन के अनहद की झंकार है वो
बज रहा सबके भीतर ये ओंकार है वो
ना आकार कोई निराकार है वो
ये वो ही है उसके सिवा और क्या है
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आवरण
कोई कमजोर दिखता है
कोई ताक़त बताता है
ये दुनिया है यहाँ हर शख़्स
मैं क्या हूँ ये जताता है
ना कमज़ोर है कोई
ना ही ताक़त किसी में है
सच से सामना ना हो
यही एक डर सताता है
किनारे रुक नहीं सकता
गहरे जा नहीं सकता
ये उथला सा है इक दरिया
इसी में डूब जाता है
मैं हूँ हस्ती मुझे देखो
ज़माने को बताता है
वहीं फिर टिक के रहने को
वो पूरा दम लगाता है
नहीं हस्ती यहाँ कोई
समय जब ये बताता है
जो पत्तों से बुना था वो
किला फिर भरभराता है