बज रही हैं मंदिर की घंटियाँ
ब्रह्मवेला में।
चिड़ियाँ चहकने लगी हैं।
अथक अरुणसारथी सवार है,
सात घोड़ों पर।
मेरे सपने अभी अंगड़ाईयाँ ले रहे हैं।
चढ़ गया है फाग,
फुनगियाँ बौराने लगी हैं ।
मधु लूट रहे हैं मधुकर,
ऋतुराज प्रणय स्वर गाता है।
मेरी अंगुलियां चल रही हैं,
उसी घिसी रिमोट पर।
सावन की रिमझिम ने,
शराबोर कर दिया,
धरती का तन – मन।
दामिनी स्वयंप्रभा बन
दमक रही है रातों में।
मेरी खिड़कियों के शीशे बंद हैं।
चमक उठी है खंजन की आँखें,
पाकर शरद की आहट।
मुस्कुराने लगा है नव शरदेन्दु
रातों में।
मैं ट्यूबलाइट में बैठा,
खबरें पढ़ रहा हूँ।
गिर रहे हैं रजत कण,
गिरिराज के उन्नत कंधों पर।
बिखर रही है स्वर्णिम रश्मियाँ,
नव हिम कण पर पड़कर।
मैं गूगल पर बर्फवारी के,
कारण ढूंढ रहा हूँ।
पाषाणजीवी न समझो,
आधुनिक हूँ मैं!
पर लग गए हैं,
चला अब चंद्र – मंगल की ओर,
मेरी संततियाँ किधर जाएंगी?





