ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
दबी होठों पे तेरे तिश्नगी मालूम होती है
बता दे क्या हुआ तुझको, दुखी मालूम होती है
मैं सुनती हूँ ग़ज़ल तेरी तो उसमें डूब जाती हूँ
बहुत उम्दा कही ये शायरी मालूम होती है
मेरी ये ज़िन्दगी मालिक ने क्यूँ ऐसी बना डाली
खुली-सी ज़िन्दगी है डायरी मालूम होती है
बुलाने पर नहीं आती, बुला लो जितना जी चाहे
उसे होगी कोई तो बेबसी मालूम होती है
चले आओ इधर भी बेक़रारी है बहुत ज़्यादा
मुझे भी आपके अंदर वही मालूम होती है
करूँ क्या ये बता मुझको समझ में कुछ नहीं आता
उजालें हैं मगर क्यूँ तीरगी मालूम होती है
मना लेना तुम ‘आभा’ को बहुत नाराज़ है तुमसे
तुम्हारे प्यार में बेज़ार-सी मालूम होती है
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ग़ज़ल-
चरागों को जलाना भी कहाँ आसान होता है
अँधेरा ही हमेशा क्यूँ मेरा मेहमान होता है
दिया जलता रहे जब तक बहुत प्यारा लगे सबको
बुझा दीपक ज़रूरत का नहीं सामान होता है
अँधेरे आँधियाँ बनकर चिराग़ों को बुझा भी लें
मगर जलते ही रहते हैं अगर फ़रमान होता है
कलेजे से लगाती है सदा देती दुआएँ भी
हर इक माँ के लिए बच्चा तो उसकी जान होता है
ज़रूरत से भी कुछ ज़्यादा अगर झुक जाये तो समझो
जो सहता है सभी कुछ जान कर नादान होता है
उड़ी है एक ख़ुशबू-सी अचानक इन फ़िज़ाओं में
महकना शौक ख़ुशबू का यही अरमान होता है
दीवारें ईंट पत्थर की, बना लो छत भी तुम चाहे
जहाँ रहता नहीं कोई बशर शमशान होता है
– आभा सक्सेना दूनवी




