ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
अपने अशआर से हर दिल को मुनव्वर कर दे
क़ैद क़ूज़े में ‘शिकस्ता’ तू समंदर कर दे
चाक पर वक़्त के रक़्साँ है ये मिट्टी कब से
ऐ ख़ुदा! अब तो मुकम्मल मेरा पैकर कर दे
बे-ज़ुबानों पे क़हर तेरी ख़ुशी की ख़ातिर!
आयते-रह्म भी नाज़िल तू दिलों पर कर दे
रात अमावस की तो कटती नहीं कोई सूरत
तीरगी को भी फ़लक सुब्ह का मंज़र कर दे
क्यों ये मज़लूम की आहों से तड़प उठता है
दर्द इफ़रात है जब दिल को ही पत्थर कर दे
तोल पलड़े में सियासत के रिआया को न तू
ज़ख़्म का उसके इलाज अब तो सितमगर कर दे
आ गया मोड़ नया फिर से कहानी में मेरी
कातिबे-बख़्त सहल ज़ीस्त घड़ी भर कर दे
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ग़ज़ल-
ज़िन्दगी हैरान थी ज़ुल्फ़-ए-परेशां की तरह
दस्ते-उल्फ़त ने संवारी है गुलिस्तां की तरह
मुद्दतों तक रूठने का ग़म मसर्रत को रहा
फ़रहतें आई हैं चलकर अब पशेमां की तरह
रहनुमाओं से किसी तरह न बन पायी मेरी
वो सभी सफ़्फ़ाक, हम थे अहले-ईमां की तरह
तिशनगी, नादारियाँ, बे-मेहरियाँ, आज़ारियाँ,
तल्ख़ियाँ मिसरी में ढाली हैं ग़ज़ल-ख़्वाँ की तरह
वहशतो-ज़ुल्मो-सितम के, नफ़रतों के दरमियाँ
ग़ैर मुमकिन हैं कोई रह जाए इंसां की तरह
बेटियाँ तक़दीर बन सकती हैं मुल्क-ओ-क़ौम की
इस हक़ीक़त से हो क्यूँ अब तक गुरेज़ाँ की तरह
आँधियों के राह में आने के अंदेशे तो थे
हसरतें हमराह थीं हर गाम तूफ़ाँ की तरह
– फ़रहत दुर्रानी शिकस्ता




