ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
बताएँ कि हम दिल कहाँ छोड़ आये
न था पास जिसके वहाँ छोड़ आये
वहीं से ख़िजां ज़िंदगी को मिली है
जहाँ अपने गुल, गुल्सितां छोड़ आये
हमीं ने उसे संग से दिल बनाया
मगर उसमें भी अपनी जां छोड़ आये
था इक दिल ज़रा-सा जो सम्हला न हमसे
यहाँ छोड़ आये, वहाँ छोड़ आये
दुबारा चले आये गाँवों मैं अपने
वो शहरों के झूठे बयां छोड़ आये
शराफ़त, मुहब्बत, मुरव्वत को ‘नेहा’
कोई उनसे पूछे कहाँ छोड़ आये
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ग़ज़ल-
कहीं से कम नहीं होती मेरे दिल की परेशानी
ख़ुशी में भी रुलाती है तेरे ग़म की फ़रावानी
मुहब्बत शुक्र कर हमने तुझे तनहा नहीं रक्खा
किसे वर्ना मयस्सर था हमारी आँख का पानी
किसी को ग़म नहीं देता जहां में आदमी ऐसा
निहा होते हैं जिसके क़ल्ब में जज़्बात इन्सानी
दुआ जब हम ग़रीबों की दुआ में डूब जाती है
हवाएँ ख़ुद ही करती हैं चराग़ों की निगेहबानी
ख़ुदा जाने ये ‘नेहा’ चार तिनकों में है क्या पिन्हा
नशेमन से नहीं हटती निगाहे-बर्क-सोज़ानी
– डॉ. नेहा इलाहाबादी




