ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
नर्म जज़्बात तेरी आँख से ज़ाहिर होते
तो नज़र में मेरी कुछ और मनाज़िर होते
हम बुलंदी के फ़लक पर भी पहुँच सकते थे
गर रियाकारी में औरों से ही माहिर होते
सह्न का बूढा शजर सोच रहा है तनहा
गर हरा होता, मेरी शाख़ पे ताइर होते
दिल से तू एक सदा देता घटाओं को अगर
फिर ये बादल तेरे ही बाम पे हाज़िर होते
मैंने दीवानगी में ऐसा भी सोचा अक्सर
अमृता होती मैं और तुम मेरे साहिर होते
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ग़ज़ल-
उसको जो मेरी याद ने नाशाद कर दिया
ये मोजज़ा अजल ने मेरे बाद कर दिया
ज़ेहनो-दिलो-ख़याल में तेरा ही है क़याम
वीरान खंडरों को भी आबाद कर दिया
ख़्वाबों में इक झलक जो दिखाई थी आपने
सोज़े-निहाँ मिटा के मुझे शाद कर दिया
क़िस्मत में पहले लिख तो चुका बेशुमार ग़म
फिर रब ने मेरे दिल को भी फ़ौलाद कर दिया
शामिल नहीं था ग़ैर कोई इसमें तो ‘अना’
साज़िश ये दिल की थी मुझे बर्बाद कर दिया
– डॉ. मंजु कछावा अना




