ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
चोट पर चोट देकर रुलाया गया
जब न रोये तो पत्थर बताया गया
हिचकियाँ कह रही हैं कि तुमसे हमें
अब तलक भी न साथी भुलाया गया
ज़िन्दगी लम्हा-ए-तर को तरसी मगर
वक़्ते-रुख़सत पे दरिया बहाया गया
ऐसे छोड़ा कि ताज़िंदगी चाहकर
फिर न आवाज़ देकर बुलाया गया
आदतें इस क़दर पक गईं देखिए
आँख रोने लगीं जब हँसाया गया
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ग़ज़ल-
यकीं मानो कि मुझसे ये नज़ारे बात करते हैं
रहूँ ख़ामोश मैं फिर भी तो सारे बात करते हैं
अँधेरी रात होती है कि ग़म भी साथ चलते हैं
अजब हैरान हूँ मुझसे सितारे बात करते हैं
समेटे दर्द बाहों में बही जाती हूँ दरिया-सी
बड़ी तस्कीन दे देकर किनारे बात करते हैं
कि इतनी ज़िल्लतें सहकर वो कैसे जी गया होगा
‘जला दें जाल नफ़रत का’ शरारे बात करते हैं
ख़ुदा जाने कि क्या होगा वतन का हाल और अपना
हमीं से ग़ैर-सा होकर हमारे बात करते हैं
– डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा




