ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
लगी चोट जबसे सहल हो गई है
बड़ी शोख़ मेरी ग़ज़ल हो गई है
कोई बात इसमें रही है यक़ीनन
कभी झोंपड़ी थी, महल हो गई है
सभी देखते हैं हमें चौंककर यूँ
समस्या हमारी जो हल हो गयी है
भरोसा नहीं इस पे कुछ भी रहा अब
ये बारिश में भीगी फ़सल हो गई है
चली याद आई है चुपके से तेरी
यूँ नयनों से ‘छाया’ सजल हो गई है
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ग़ज़ल-
करिश्मा अचानक वो दिखला रहे हैं
बहुत बदले-बदले नज़र आ रहे हैं
खटक उनके मन में हुई है यक़ीनन
दबे पाँव महफ़िल से जो जा रहे हैं
शराबे-मुहब्बत मैं पीने चली हूँ
पसीने फ़रिश्तों को क्यों आ रहे हैं
ये बेटे ही पटकेंगे बाहर पिता को
अभी तो वसीयत ही लिखवा रहे हैं
ख़लिश सीने में है ज़ुबां कह न पाए
वो अन्दर ही अन्दर घुटे जा रहे हैं
– छाया शुक्ला




