ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
आज बिकने लगी है ख़ुशी दोस्तो
क़ीमती है कहाँ ज़िन्दगी दोस्तो
भीड़ में भी यहाँ लोग तनहा हुए
इस तरह सब में दूरी हुई दोस्तो
दर्द जब अपनी हद से गुज़रने लगा
तब भी कब आँख में थी नमी दोस्तो
रात भर हर तरफ था धुआँ ही धुआँ
आग यूँ नफ़रतों की लगी दोस्तो
बन गए दिल ही जब पत्थरों के नगर
‘भावना’ इस जहां से चली दोस्तो
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ग़ज़ल-
कहीं मातम मना है और कहीं त्योहार क्यों है
कहीं सुलझे हुए दिल और कहीं मँझधार क्यों है
जहां में प्यार का पैग़ाम दे भेजा गया था
दिलों में आज नफ़रत की खिंची दीवार क्यों है
चराग़ों को निगल जाते यहाँ रोशन अँधेरे
सुबह से ही सिमटकर भागता संसार क्यों है
नहीं जिसका रहा माली भला फिर कौन पूछे
कि पत्ता हर कली से आजकल बेज़ार क्यों है
कही अच्छा नहीं होता है क्या सारे शहर में
गुनाहों की ख़बर से ही भरा अख़बार क्यों है
छिपाये हाथ में खंजर कि मीठा बोलते हैं
यहाँ हर आदमी का दोगला किरदार क्यों है
नहीं पलती दिलों में आजकल सबके हिफ़ाजत
कि हर एक आदमी की भावना बीमार क्यों है
– भावना दीपक मेहरा




